Puja Builders & Devlopers

Puja Builders & Devlopers on this Page u Rcvd knowledge By Shree Shree Ravishankarg Art of Living ,Jai Gurudev

30/11/2019
16/05/2019

हाथ उठाउँ और तेरा नाम न लूँ, केसे मुमकिन है,

तू मेरी दुआओं में शामिल है आमीन की तरह...!

#जयगुरूदेव

20/04/2019

Pl like page Puja Builders and Developers , Develope u r Spirituality ¡ jai gurudev

19/04/2019

सम्पूर्ण सन्तुलन ः~
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जो व्यक्ति स्वतंत्र है, उन्हें यह खेद है कि उनमें अनुशासन नहीं।वे बार- बार प्रतिज्ञा करते हैं कि वे कुछ संयम में रहेंगे।
जो व्यक्ति नियंत्रण में रहते हैं, वे उसके समाप्त होने का इंतजार करते हैं। अनुशासन अपने - आप में अन्त नहीं, एक साधन है।
उन व्यक्तियों को देखो जिनमें जरा भी अनुशासन नहीं है; उनकी अवस्था दयनीय है। अनुशासन- हीन स्वतंत्रता अति दु:खदायी है।और स्वाधीनता के बिना अनुशासन से भी घुटन होती है। सुव्यवस्था में नीरसता है और अव्यवस्था तनावपूर्ण होती है। हमें अपने अनुशासन को आजाद व स्वतंत्रता को अनुशासित करना है।
जो व्यक्ति हमेशा साथियों से घिरे हैं, वे एकांत का आराम ढूँढते हैं। एकांत में रहने वाले व्यक्ति अकेलापन अनुभव करते हैं और साथी ढूँढते हैं। ठंड में रहने वाले लोग गर्म स्थान चाहते हैं; गर्म प्रदेश में रहने वाले ठंड पसंद करते हैं। जीवन की यही विडम्बना है।
प्रत्येक व्यक्ति सम्पूर्ण सन्तुलन की खोज में है।
सम्पूर्ण सन्तुलन तलवार की धार की तरह है।
यह सिर्फ आत्मा में ही पाया जा सकता है।
राधे राधे🌹🌻🌺

01/04/2019

इस संसार में शरीर धारण करने वाली आत्माओं के बीच जो स्नेह, सौहार्द का आपसी नाता है उसे ही प्रेम कहा जाता है ।

यह एक ऐसी कोमल आकर्षक और पवित्र भावना है जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में बंधे ग्रहों की तरह हमें एक दूसरे की ओर खींचती है ।

प्रेम आत्मा का मूल गुण है । आत्मा प्रेम स्वरूप है । प्रेम से ही भीतरी सुख की उत्पत्ति होती है और यह भीतर का सुख जब चरम सीमा पर पहुंच जाता है तो आनंद कहलाता है ।

प्रेम का आधारः

प्रेम परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता । यह व्यक्ति की भौतिक प्राप्तिओं और अप्राप्तिओं के आधार पर ज्यादा कम नहीं होता । यह भीतर से बहने वाला एक निरंतर झरना है जिसमें कोई हदबंदी नहीं होती ।

प्रेम का आधार आत्मीयता है और आत्मीयता अर्थात् स्वयं को भी आत्मा समझना और दूसरे को भी आत्मा की दृष्टि से देखते हुए आत्मवत व्यवहार करना ।

प्रेम से लाभः

प्रेम का गुण जब हमारे अंदर ईमर्ज होता है तब कई गुण स्वतः ही हमारे अंदर विकसित हो जाते हैं । जैसे एक दूसरे के प्रति कल्याण की भावना पैदा होती है । हम दूसरे के लिए अपने सुख को त्यागने मे भी सुख की अनुभूति करते है । प्रेम की लहरें मानव मन के मैल को धो देती हैं । विशुद्ध प्रेम हमारे अंदर आत्मविश्वास पैदा करता है जिससे हम निर्भय रहते हैं और हमारा जीवन स्थाई खुशी तथा उल्लास से भरपूर रहता है ।

जबकि मोह शरीर भान पर आधारित अशुद्ध प्यार है । यह मैं और मेरा की कठोर दीवारों से घिरा हुआ हद का भाव है और देह के संबंधों में आसक्त रहता है । यह आसक्ति काम और लोभ को भी जन्म देती है । मोह जिसके मन में होता है एक दिन उसे रुलाता है और जिसके प्रति होता है उन्हें बिगड़ता है ।

मोह प्रेम न होकर एक मानसिक बंधन है । यह भावनाओं पर लगी हथकड़ियों और बेड़ियों की तरह है परंतु व्यक्ति भ्रम वश इन बेड़ियों को अपना सहारा समझ लेता है ।

मोह स्वार्थ और कामना-जनित होता है । मोह के पाश मे बंधे व्यक्ति की निर्णय शक्ति मारी जाती है, वह विवेक शून्य हो जाता है और स्मृति भ्रष्ट हो जाती है । इसमें दोनों पक्ष परतंत्र रहते हैं । दोनों ही एक दूसरे पर अपना आधिपत्य चाहते हैं । यह कई दुर्गुणों जैसे ज़िद्द, उदासी, नफरत, बदला आदि को जन्म देता है ।

मोह में अपने प्रिय पात्र को ऊंचा उठाने की क्षमता नहीं होती जबकि प्रेम में दूसरे को ऊपर उठाने, उसे महानता के शिखर पर पहुंचाने और विश्व कल्याण के निमित्त बना देने की अद्वितीय शक्ति छिपी है । इसीलिए हम प्रेम की शक्ति से विश्व को स्वर्ग बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है ।

परमात्मा भी प्रेम का सागर है । उनके साथ हमारे प्रेम को भक्ति अथवा योग कहा जाता है ।

परमात्मा प्रेम निस्वार्थ होता है । परमात्म प्रेम में वह शक्ति है जो प्रबल प्रवाह बन फूटती है और हम सबके जीवन को आनंद से सराबोर कर देती है । पर इसके लिए हमे मोह के बंधन से मुक्त होना होगा ।

हमें मोह से निवृत्ति करने के लिए आत्मिक दृष्टि वृत्ति बनानी होगी और शरीर और पदार्थों के बजाय आत्मा और गुणों से प्रेम करना होगा और परमपिता परमात्मा से अपना बुद्धि योग जोड़ना होगा । तभी हम परमात्म प्यार के पात्र बन पाएंगे ।

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