30/05/2020
मेघदूत में यक्ष की पीड़ा को कौन नहीं जानता? मेघदूत पढ़ते हुए जब आकाश में घुमड़ते बादल देखे तो ये गीत उतर आया!
देख कर आकाश में उड़ते हुए बादल ....
भीगकर सहसा तुम्हारी याद में पागल
हो गया है यक्ष जैसा मन !
उर्मिला के कक्ष जैसा मन!
दे दिया है बादलों को पत्र मैंने
मन करे तो बाँच लेना प्यार मेरा
मात्र अक्षर की नहीं ये शब्द माला
है विकलता का सघन संसार मेरा,
बिन तुम्हारे मन बना वीरान सा मरुथल
एक मृगतृष्णा चिढ़ाती है मुझे प्रतिपल
जबकि आँखों में घिरा सावन!
अनगिनत कोशिश विकल मन कर चुका है
पर विवशता को नहीं है लाँघ पाया
पिस गया धरती गगन के बीच में पर
एक क्षण तुमको नहीं इसने भुलाया
ये हवा छू खोलती है याद के साँकल
तुम बजा देते थे ऊँगली से मेरी पायल
जी हुआ है देख लूँ दर्पण!
बारिशों से भर रहे हैं ताल नदियाँ
और ये मन रिक्त होता जा रहा है,
ख़त्म होंगे कब विरह के ये निठुर पल
प्रेम भी अस्तित्व खोता जा रहा है!
भावना के पर्वतों पर मन पड़ा घायल..
जो चपल था भूल बैठा आज हर हलचल
छू इसे दे दो नया जीवन!
©️अंकिता सिंह