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 #यह प्रसिद्ध दोहा संत कबीरदास जी द्वारा रचित है, जो जीवन की क्षणभंगुरता, नश्वरता और बिछड़ने के अटूट सत्य को दर्शाता है।...
24/04/2026

#यह प्रसिद्ध दोहा संत कबीरदास जी द्वारा रचित है, जो जीवन की क्षणभंगुरता, नश्वरता और बिछड़ने के अटूट सत्य को दर्शाता है। इसमें पत्ता वृक्ष से कहता है कि अब जब हम अलग होंगे, तो फिर कभी नहीं मिलेंगे और दूर कहीं चले जाएंगे, ठीक वैसे ही जैसे शरीर और आत्मा के बिछड़ने के बाद पुनर्मिलन असंभव है।

दोहे का अर्थ और संदेश:
मूल अर्थ: जब पत्ता पेड़ से गिरता है, तो वह कहता है- "हे वन के राजा वृक्ष! अब हम अलग हो रहे हैं, तो दोबारा नहीं मिलेंगे। मैं दूर कहीं गिरकर नष्ट हो जाऊँगा"।
भावार्थ: यह दोहा संसार की निस्सारता को दर्शाता है। भौतिक शरीर का रिश्ता भी ऐसा ही है; एक बार टूटने के बाद दोबारा नहीं मिलता।
शिक्षा: यह हमें यह सिखाता है कि सांसारिक रिश्ते अस्थायी हैं, और हमें किसी भी चीज़ से बहुत अधिक मोह नहीं रखना चाहिए क्योंकि बिछड़ना निश्चित है।
यह पंक्तियाँ कबीर ग्रंथावली से ली गई हैं। #

 #यह कबीरदास जी द्वारा रचित एक प्रसिद्ध दोहा है, जो ज्ञान और कर्म के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है। इसका अर्थ है कि सच्च...
18/04/2026

#यह कबीरदास जी द्वारा रचित एक प्रसिद्ध दोहा है, जो ज्ञान और कर्म के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है। इसका अर्थ है कि सच्चे ज्ञानी लोग पारखी जौहरी की तरह होते हैं जो सत्य को पहचानते हैं, जबकि बिना ज्ञान के केवल कर्मकांड करने वाले लोग मजदूर के समान हैं, जो व्यर्थ ही संसार (शरीर रूपी) का बोझ ढो रहे हैं।

विस्तृत अर्थ:
ज्ञानी जन है जौहरी: ज्ञानी व्यक्ति जौहरी की तरह है जो सत्य (हीरा) और असत्य (काँच) के बीच का अंतर जानता है।
करमी सकल मजूर: ज्ञान के बिना केवल कर्मकांड, पूजा-पाठ या सांसारिक कार्यों में लगे रहने वाले लोग मजदूर की तरह हैं।
देह भार को टोकरा, लिए सीस भरपूर: ऐसे अज्ञानी लोग अपने शरीर को ही सब कुछ मानकर सांसारिक मोह-माया के बोझ को सिर पर उठाए फिरते हैं, बिना जीवन के असली उद्देश्य को समझे।

भावार्थ: कबीरदास जी बाहरी आडंबर के बजाय ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार पर जोर देते हैं। बिना ज्ञान के किए गए कर्म निरर्थक हैं, जैसे बोझ ढोना। #

17/04/2026

मुन्शी प्रेमचंद जी✍️🙏💕

#मुन्शी #प्रेमचंद_की_पंक्तियां

“The enjoyments that are born of contact are only sources of sorrow, for they have a beginning and an end.”~Krishna from...
16/04/2026

“The enjoyments that are born of contact are only sources of sorrow, for they have a beginning and an end.”
~Krishna from the Gita

“Where one sees nothing else, hears nothing else, knows nothing else—that is the Infinite. The Infinite is happiness.”
~Chandogya Upanishad

 #कबीरदास जी के इस दोहे का अर्थ है कि मनुष्य को अपने ऊँचे मकान, धन-संपत्ति या पद को देखकर अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंक...
16/04/2026

#कबीरदास जी के इस दोहे का अर्थ है कि मनुष्य को अपने ऊँचे मकान, धन-संपत्ति या पद को देखकर अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि मृत्यु के बाद इस शरीर को मिट्टी में ही लेटना है और ऊपर घास जम जानी है। यह दोहा जीवन की नश्वरता और अहंकार त्याग की सीख देता है।

कबीर दास जी के दोहे का अर्थ (भावार्थ):
दोहा:
कबीरा गर्व न कीजिये, ऊँचा देखि अवास।
काल परौ भुंइ लेटना, ऊपरि जामे घास।।
अर्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि ऊँचे-ऊँचे महल (आवास) देखकर गर्व न करें। आने वाले समय में (मृत्यु के बाद) तुम्हें जमीन (भुइँ) पर ही लेटना होगा, और फिर उस शरीर के ऊपर घास उग आएगी।
संदेश: यह जीवन क्षणभंगुर है और मृत्यु अटल है। इसलिए अपनी संपत्ति या शक्ति पर घमंड करना व्यर्थ है क्योंकि अंत में सब कुछ नष्ट हो जाना है।
यह दोहा हमें यह सिखाता है कि हमें विनम्र रहना चाहिए और भौतिक वस्तुओं से मोह नहीं करना चाहिए।

15/04/2026

काटकर ग़ैरों की टाँगे ख़ुद लगा लेते हैं लोग
इस शहर में इस तरह भी क़द बढ़ा लेते हैं लोग

 #यह दोहा भक्ति की पराकाष्ठा, निश्छल प्रेम और सामाजिक बंधनों से मुक्ति को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि जब भक्त ईश्वर के प...
15/04/2026

#यह दोहा भक्ति की पराकाष्ठा, निश्छल प्रेम और सामाजिक बंधनों से मुक्ति को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि जब भक्त ईश्वर के प्रति निश्छल प्रेम (भाव) में पूरी तरह डूब जाता है, तब वह दुनिया की सामाजिक मर्यादाओं और परंपराओं (कुल की रीत) को छोड़ देता है। बाहरी आडंबर (मंदिर/कर्मकांड) पीछे छूट जाते हैं और अंततः सच्चे प्रेम (ईश्वर-भक्त का संबंध) की ही जीत होती है।
भावार्थ:
भक्त बँधा जब भाव में, छूटी कुल की रीत: जब मीराबाई जैसी भक्ति जागृत होती है, तो कुल-खानदान की मर्यादा, लोक-लाज या सामाजिक नियम गौण हो जाते हैं। प्रेम की भावुकता में व्यक्ति बंधनों से मुक्त हो जाता है।
मंदिर सूना पड़ गया, जीत गई फिर प्रीत: बाहरी आडंबर या मंदिर में की गई पूजा-पाठ तब सूनी (व्यर्थ) लगने लगती है, जब ईश्वर हृदय के भीतर बस जाते हैं। सच्चे प्रेम (प्रीत) के सामने लौकिक रीतियां और दिखावा हार जाते हैं, और प्रेम ही विजय प्राप्त करता है।
संक्षेप में, यह पंक्तियां दर्शाती हैं कि ईश्वर को पाने के लिए बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि हृदय की सच्ची प्रीति आवश्यक है। #

लोकतंत्र निर्थक हो गया है l
15/04/2026

लोकतंत्र निर्थक हो गया है l

भारत के संविधान निर्माता कहे जाने वाले डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने साल 1953 में बीबीसी को एक इंटरव्यू दिया था. देखिए, इस .....

 #यह पंक्तियां गुरु नानक देव जी की गहरी आध्यात्मिक शिक्षा को दर्शाती हैं। इनका सरल अर्थ यह है: सकारात्मक दृष्टिकोण: अगर ...
14/04/2026

#यह पंक्तियां गुरु नानक देव जी की गहरी आध्यात्मिक शिक्षा को दर्शाती हैं। इनका सरल अर्थ यह है:
सकारात्मक दृष्टिकोण: अगर ईश्वर (करतार) की कृपा हमारे साथ है और हमारा मन उनकी भक्ति में लीन है, तो हर पल, हर दिन और हर घड़ी हमारे लिए शुभ और मंगलकारी है।
सच्ची 'भद्रा' (अशुभ समय): गुरु साहिब समझाते हैं कि असली बुरा वक्त या 'भद्रा' तब नहीं होती जब नक्षत्र खराब हों, बल्कि तब होती है जब हम परमात्मा को भूल जाते हैं या अपने सत्कर्मों से भटक जाते हैं।
संक्षेप में, यह संदेश हमें वहम-भरम और अंधविश्वासों से ऊपर उठकर परमात्मा पर विश्वास रखने और हमेशा नेक राह पर चलने की प्रेरणा देता है। #

 #झूठा सब संसार है, कोउ न अपना मीत || राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत" कबीर दास जी का एक प्रसिद्ध दोहा है। यह संसार ...
13/04/2026

#झूठा सब संसार है, कोउ न अपना मीत || राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत" कबीर दास जी का एक प्रसिद्ध दोहा है। यह संसार नश्वर और असार (माया) है, यहाँ कोई सच्चा साथी नहीं है। केवल राम/हरि नाम का सच्चा ज्ञान ही इंसान को भवसागर (जन्म-मरण के चक्र) से मुक्ति दिला सकता है।

कबीर वाणी का अर्थ (भविष्यवाणी/चेतावनी):
मायावी संसार: कबीर जी चेतावनी देते हैं कि संसार की सभी वस्तुएं और रिश्ते अस्थायी हैं।
सत्य क्या है?: एकमात्र शाश्वत और सच्चा सत्य परमात्मा (राम/हरि नाम) है।
भविष्यवाणी: जो व्यक्ति इस नश्वरता को समझकर प्रभु नाम का आश्रय लेता है, वही इस संसार रूपी भवसागर (मुश्किलों/माया) को पार कर सकता है।
सार: मोह-माया छोड़कर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए। #

11/11/2025

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