Er Ankesh Bhandari

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सोच उस हिमालय की तरह अडिग है जिसे कोई झुका नहीं सकता ,यदि मन में ठान लिया तो करके ही रहेंगे ,उद्देश्य राजनीति करने का नहीं एक नए युग के लिए बदलाव लाने का है सबको साथ लेकर एक नई इबादत गड़ने का इरादा लेकर चलने का है ,आओ मिलकर कुछ नया करने का प्रयास करते हैं

धड़ाम धामी के राज में  विकसित होता उत्तराखंड की एक तस्वीर ।16 करोड़ खर्च, 16 दिन में खत्म!पहली बारिश ने बता दिया कि पुल ...
28/07/2026

धड़ाम धामी के राज में विकसित होता उत्तराखंड की एक तस्वीर ।

16 करोड़ खर्च, 16 दिन में खत्म!
पहली बारिश ने बता दिया कि पुल सीमेंट से कम, भ्रष्टाचार की नींव पर ज्यादा खड़ा था।
जनता जवाब मांग रही है—जिम्मेदार कौन?

सद्बुद्धि दे इन सनातन के ठेकेदारों को ! "देवभूमि उत्तराखंड की आराध्य देवी मां नंदा केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि हम...
28/07/2026

सद्बुद्धि दे इन सनातन के ठेकेदारों को !

"देवभूमि उत्तराखंड की आराध्य देवी मां नंदा केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र हैं। ऐसे पवित्र स्मृति चिन्ह पर मां नंदा देवी के नाम के स्थान पर राजनीतिक दल का स्टिकर लगाना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि यह आस्था का राजनीतिकरण करने का एक शर्मनाक प्रयास भी प्रतीत होता है।

जो पार्टी स्वयं को सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी हितैषी बताती है, वही यदि धार्मिक प्रतीकों को अपने राजनीतिक प्रचार का माध्यम बनाए, तो यह दोहरे चरित्र को उजागर करता है। आखिर मां नंदा का सम्मान बड़ा है या पार्टी का प्रचार?

हम स्पष्ट कहना चाहते हैं कि देवी-देवताओं को किसी राजनीतिक दल की पहचान से जोड़ना सनातन परंपरा का अपमान है। देवभूमि की जनता धर्म के नाम पर राजनीति नहीं, बल्कि धर्म और आस्था का सम्मान चाहती है।

हम मांग करते हैं कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो तथा यदि किसी ने जानबूझकर धार्मिक स्मृति चिन्ह के साथ ऐसा किया है तो उसके विरुद्ध उचित कार्रवाई की जाए। आस्था पर राजनीति की मुहर लगाने की कोशिश किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।"

"शौर्य, साहस और सर्वोच्च बलिदान का अमर प्रतीक – कारगिल विजय दिवस"26 जुलाई भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है, जब भारती...
26/07/2026

"शौर्य, साहस और सर्वोच्च बलिदान का अमर प्रतीक – कारगिल विजय दिवस"

26 जुलाई भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है, जब भारतीय सेना के अदम्य साहस, अटूट संकल्प और अद्वितीय पराक्रम ने कारगिल की दुर्गम चोटियों पर तिरंगे की शान को फिर से स्थापित किया। यह केवल एक सैन्य विजय नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, त्याग और वीरता की ऐसी गाथा है, जो हर भारतीय के हृदय में सदैव जीवित रहेगी।

हम उन अमर वीरों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके त्याग ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की सीमाओं की ओर उठने वाली हर बुरी नज़र का उत्तर हमारे वीर जवान अपने साहस और शौर्य से देना जानते हैं।

उत्तराखंड की वीरभूमि ने भी देश को अनगिनत रणबांकुरे दिए हैं, जिन्होंने कारगिल सहित अनेक युद्धों में अपने प्राण न्यौछावर कर राष्ट्र का गौरव बढ़ाया। उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अमर स्रोत रहेगा।

कारगिल विजय दिवस हमें केवल वीरों को याद करने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह संकल्प लेने का भी दिन है कि हम एक मजबूत, सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में अपना योगदान देंगे। देश के सैनिकों के सम्मान, राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सर्वोपरि रखना हम सभी का कर्तव्य है।

आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी अपने वीर शहीदों को नमन करते हुए यह संकल्प लें कि उनके सपनों का भारत और उनके आदर्शों का उत्तराखंड बनाने के लिए सदैव राष्ट्रहित को सर्वोच्च स्थान देंगे।

शत-शत नमन भारत माता के वीर सपूतों को।
जय जवान! जय भारत!
वंदे मातरम्! 🇮🇳

— इं. अंकेश भंडारी
केंद्रीय प्रवक्ता, उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद)
थराली विधानसभा

उत्तराखंड क्रांति दल के 48वें स्थापना दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ"संघर्ष हमारी पहचान, स्वाभिमान हमारा अभियान"आज उत्तराखंड...
25/07/2026

उत्तराखंड क्रांति दल के 48वें स्थापना दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ

"संघर्ष हमारी पहचान, स्वाभिमान हमारा अभियान"

आज उत्तराखंड क्रांति दल के 48वें स्थापना दिवस के पावन अवसर पर उन सभी महान आंदोलनकारियों, शहीदों और समर्पित कार्यकर्ताओं को शत-शत नमन, जिनके अथक संघर्ष, त्याग और बलिदान ने पृथक उत्तराखंड राज्य के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उत्तराखंड क्रांति दल केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि उत्तराखंड के स्वाभिमान, अस्मिता और जनभावनाओं का प्रतीक है। इस दल का जन्म पहाड़ की पीड़ा, युवाओं के भविष्य, मातृशक्ति के सम्मान, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और उत्तराखंड के सर्वांगीण विकास के संकल्प के साथ हुआ था।

आज भी राज्य के सामने पलायन, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, भूमि संरक्षण और पर्यावरण जैसे अनेक गंभीर प्रश्न खड़े हैं। ऐसे समय में उत्तराखंड क्रांति दल का मूल उद्देश्य और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। हमारा संकल्प है कि उत्तराखंड की पहचान, संसाधनों और अधिकारों की रक्षा करते हुए एक समृद्ध, स्वावलंबी और आत्मनिर्भर राज्य का निर्माण किया जाए।

आइए, इस स्थापना दिवस पर हम सभी संकल्प लें कि उत्तराखंड के हितों को सर्वोपरि रखते हुए राज्य के सम्मान, युवाओं के भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल कल के लिए एकजुट होकर कार्य करेंगे।

उत्तराखंड का स्वाभिमान – उत्तराखंड क्रांति दल।
जय उत्तराखंड! जय भारत!

— इं. अंकेश भंडारी
केंद्रीय प्रवक्ता, उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद)
थराली विधानसभा

24/07/2026

क्या उत्तराखंड की मां बहन बेटियों का आत्मसम्मान किसी दमनकारी के सम्मान से बढ़ कर है ??

जिस मुलायम सिंह यादव ने उत्तराखंड पृथक राज्य आंदोलन के दौरान हमारी मां बहन बेटियों पर लाठी चार्ज करवाई उनके साथ बर्बरता पूर्ण जैसी घटना को अंजाम दिया बलातकार जैसे कुकर्म करवाए वो चाहे रामपुर तिराहे कांड हो या मुजफ्फरनगर जैसे विभित्सक नरसंहार की घटना हो उसको पूरी दमनता के साथ किया और आज बीजेपी की केंद्र सरकार ने उसी को पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा आखिर क्यों क्या उत्तराखंड की मां बहन बेटियों के साथ किए दुराचार एवं अभद्रता और नरसंहार के लिए यह पुरस्कार दिया ?? क्या मुलायम सिंह का सम्मान हमारी मां बहन बेटियों के आत्मसम्मान से बढ़ कर था ?? क्यों नहीं राज्य की बीजेपी की सरकार ने इसका विरोध किया ?? आखिर क्या हमारी मां बहन बेटियां सिर्फ तुम्हारी वोट बैंक मात्र है ?? इनका दोहरा चेहरा चाल चरित्र जनता के सामने है, यह राज्य हमारी मां बहन बेटियों के रक्त से सिंचित होकर ही मिला है इसलिए उनके संघर्ष और वीरता का अपमान हम नहीं सहन कर सकते हैं ,बीजेपी माफी मांगे प्रदेश की मां बहन बेटियों से,ऐसी निकमी सरकार को सत्ता से बाहर फेंकना ही पड़ेगा जो सत्ता के लिए हमारी मां बहन बेटियों के आत्मसम्मान की तिलांजी तक दे दे ऐसी निकमी सरकार को सत्ता में बने रहने का कोई औचित्य नहीं ।।

24/07/2026

सनातन की आस्था पर चोट बर्दाश्त नहीं

वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में जिस प्रकार सनातन धर्म से जुड़े प्रमुख तीर्थस्थलों पर कथित वित्तीय अनियमितताओं और चोरी की घटनाओं के आरोप सामने आए हैं, वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। जिस राजनीतिक दल ने सत्ता प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम और मंदिरों की आस्था को अपना प्रमुख आधार बनाया, उसी के शासनकाल में अयोध्या श्रीराम मंदिर, श्री बद्रीनाथ धाम और श्री केदारनाथ धाम जैसे पवित्र स्थलों से जुड़ी करोड़ों रुपये की कथित चोरी और अनियमितताओं की खबरों ने करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई है।

यह केवल धन का मामला नहीं है, बल्कि करोड़ों सनातन श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और श्रद्धा पर सीधा प्रहार है। जो लोग स्वयं को सनातन धर्म का सबसे बड़ा रक्षक और ध्वजवाहक बताते हैं, उनके शासनकाल में यदि ऐसे गंभीर आरोप सामने आते हैं, तो स्वाभाविक रूप से जनता सरकार की नीयत और कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाएगी।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) जैसे अत्यंत प्रतिष्ठित और संवेदनशील संस्थान का अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को किस आधार पर बनाया गया, जिस पर पहले से विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हों। क्या सरकार ने नियुक्ति से पहले उनकी पृष्ठभूमि की जांच नहीं की? यदि की थी, तो फिर ऐसी नियुक्ति क्यों की गई? यदि नहीं की, तो यह प्रशासनिक लापरवाही है। इन सवालों का जवाब जनता को मिलना चाहिए।

सरकार लगातार "जीरो टॉलरेंस" और "न खाएंगे, न खाने देंगे" की बात करती है। ऐसे में यदि धार्मिक संस्थाओं से जुड़े गंभीर आरोप सामने आते हैं, तो निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए संबंधित जिम्मेदार पदाधिकारियों को जांच पूरी होने तक पद से हटाना लोकतांत्रिक और नैतिक कदम होना चाहिए। इससे जांच पर किसी प्रकार के प्रभाव की आशंका भी समाप्त होगी और जनता का विश्वास भी बना रहेगा।

यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति पर चलती है, तो उसे किसी भी व्यक्ति को केवल पद के कारण संरक्षण नहीं देना चाहिए। छोटी मछलियों पर कार्रवाई और बड़े लोगों को बचाने की धारणा लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था, दोनों के लिए घातक है।

सनातन किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। यह करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और सभ्यता का आधार है। इसलिए किसी भी प्रकार की अनियमितता, भ्रष्टाचार या चोरी के आरोपों की निष्पक्ष, समयबद्ध और पारदर्शी जांच होनी चाहिए तथा दोषी पाए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी पद या राजनीतिक दल से जुड़ा क्यों न हो।

23/07/2026
23/07/2026
18/07/2026

उत्तराखंड के विकास और वन नीति पर सवाल

आख़िर ज़रूरत मंद जगह तक विकाश नहीं पहुँचा पा रहे हैं?? जहाँ आवश्यक नहीं वहाँ क्यों वनों के कटान पर आमदा हो??

आज उत्तराखंड का सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर विकास का पैमाना क्या है? जिन गांवों को आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा नसीब नहीं हुई, वहां के लोग वर्षों से सरकार और वन विभाग के दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते थक चुके हैं। आखिर क्यों?

जहां एक ओर दूरस्थ गांवों की जीवनरेखा बनने वाली सड़कों के प्रस्ताव वर्षों तक फाइलों में धूल खाते रहते हैं, वहीं दूसरी ओर जहां सड़कें पहले से मौजूद हैं, वहां चौड़ीकरण और अन्य परियोजनाओं के नाम पर हजारों पेड़ों की कटाई की अनुमति इतनी तेजी से कैसे मिल जाती है? क्या वन संरक्षण के नियम केवल उन गांवों के लिए हैं जो आज भी विकास की प्रतीक्षा कर रहे हैं?

1972 के वन कानून का उद्देश्य जंगलों की रक्षा करना था, लेकिन क्या इन कानूनों का उपयोग आज उन लोगों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखने के लिए किया जा रहा है, जो दशकों से सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं? यदि किसी गांव की सड़क को वर्षों तक इसलिए रोका जाता है कि वह वन भूमि से गुजरती है, तो फिर बड़े-बड़े राजमार्गों और शहरी परियोजनाओं के लिए हजारों पेड़ों की कटाई का रास्ता इतनी आसानी से कैसे साफ हो जाता है?

मेरा अपना गांव आज भी सड़क के लिए आंदोलित है। सैद्धांतिक स्वीकृति मिलने और टोकन ग्रांट जारी होने के बाद भी कार्य आगे नहीं बढ़ता। आखिर ऐसी कौन-सी बाधा है जो केवल गांवों के विकास के समय सामने आती है? जबकि दूसरी ओर अनेक परियोजनाओं में सारी प्रक्रियाएं आश्चर्यजनक गति से पूरी हो जाती हैं।

आज उत्तराखंड में बढ़ते पलायन का सबसे बड़ा कारण केवल रोजगार नहीं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं का अभाव भी है। जब गांव तक सड़क नहीं पहुंचेगी, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सरकार को यह समझना होगा कि पहाड़ बचाने हैं तो पहले पहाड़ के गांव बचाने होंगे।

ऋषिकेश–देहरादून हाईवे पर कुछ मिनटों का समय बचाने के लिए यदि हजारों पेड़ों की बलि दी जा सकती है, तो फिर दूरस्थ गांवों तक सड़क पहुंचाने के लिए वन कानून इतनी बड़ी बाधा क्यों बन जाते हैं? यह दोहरा मापदंड उत्तराखंड की जनता के मन में गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

आज हजारों नागरिक, सामाजिक संगठन और पर्यावरण प्रेमी अनावश्यक वन कटान के विरोध में आवाज़ उठा रहे हैं। सरकार को विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसी नीति अपनानी चाहिए, जिसमें अनावश्यक पेड़ों की कटाई पर रोक लगे और जिन गांवों तक आज भी सड़क नहीं पहुंची है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

उत्तराखंड का भविष्य तभी सुरक्षित होगा, जब जंगल भी बचेंगे और गांव भी बसेंगे।
Pushkar Singh DhamiSubodh UniyalMahendra Bhatt

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