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Anil Yadav & Co is a second generation company which has imbibed the sp

27/02/2016

नोएडा: ग्रेटर नोएडा के जारचा क्षेत्र में जमीन से आग निकलती है। जी हां, इस आग से एक व्यति घायल हो गया। इस दौरान उस व्यक्ति के दोनों पैर जल गए। इससे पहले भीकई बार जानवरों के आलावा कई लोग भी इस आग में जलकर घायल हो चुके हैं।

दरअसल एनटीपीसी एरिया में ज़मीन इतनी जवलनशील है, कि इस वजह से कहीं भी आग लग जाती है। आपको बता दें, यहां की जमीन इस कारण बिलकुल काली पड़ चुके है। अब हालात यह हैं कि इससे फसलें भी बरबाद हो जाती हैं। आए दिन हादसे होते रहते हैं। लेकिन प्रशाशन इन सब चीजों से अंजान है।

ग्रेटर नोएडा के जारचा क्षेत्र के एनटीपीसी के पास के गांव में जहा ज़मीन में इतनी आग है कि अगर वहां पत्थर मारा जाए तो तुरंत आग लग जाएगी। यहां से कोई भी अगर गुज़रता है तो वो आग में झुलस जाता है।

शुक्रवार को पास के ऊचा गांव के किसान अपने खेतों पर जा रहे। तभी उनके दोनों पैर इसी आग में झुलस गए, जिसमे वो बुरी तरह घायल हो गए। जमीन की सतह से आग का अनुमान नहीं हो पाता। ऐसे में जो उस क्षेत्र से गुजरता है व जैसे ही उस जगह पांव रखता है, पैर वहीं धंस जाता है और घायल हो जाते हैं।

ऐसे में इस घटना का शिकार यह मजदूर भी हो गया। घायल हुआ किसान फ़िलहाल अस्पताल में एडमिट है। अस्पताल में फिलहाल मरीज का इलाज़ चल रहा है। इस घटना के बाद एनटीपीसी के कर्मचारी कई घंटो से पानी डालकर आग को भुजाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन ज़मीन से आग के धुएं निकल रहे है।

हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मसले पर न तो कोई प्रशाशनिक अधिकारी और न ही एनटीपीसी का कोई अधिकारी बोलने को तैयार है। फ़िलहाल इस हादसे में घायल का इलाज़ एनटीपीसी के अस्पताल में चल रहा है।

26/02/2016

वियतनाम ने भारत को दक्षिणी सागर में अपने 200 नौटिकल मील के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में भारत को ऑयल एक्सप्लोरेशन के लिए आमंत्रित किया है। भारत में वियतनाम के राजदूत ने दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा है कि भारत ने दक्षिण चीन सागर पर जो स्टैंड लिया है, वियतनाम उसकी प्रंशसा करता है। उन्होंने कहा कि वियतनाम अपनी संप्रभुता की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।



आपको बता दें कि दक्षिण चीन सागर को लेकर चीन, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और जापान के बीच आपस में मतभेद चल रहे हैं। चीन लगभग पूरी दक्षिण चीन सागर पर अपना क्षेत्र बताता है। ये क्षेत्र इसलिए भी अहम है क्योंकि दुनिया के सालाना कारोबार में से एक बड़ा हिस्सा इस क्षेत्र से गुजरता है।

04/02/2016

टीकमगढ़: आपने सोने-चांदी और कीमती चीजों की रखवाली के लिए हथियारबंद गार्ड की तैनाती के बारे में तो अक्सर सुना और देखा भी होगा। लेकिन आप से कहा जाए कि एक जगह ऐसी भी ही जहां पानी की रखवाली के लिए हथियारबंद सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है तो शुरूआत में सुनकर अटपटा जरूर लगेगा।


दरसअल, मध्यप्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड के टीकमगढ़ में आजकल बिल्कुल ऐसा ही हो रहा है। यहां एक नहर के पानी की रखवाली में तीन चार हथियारबंद गार्ड हर समय तैनात रहते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकी टीकमगढ़ नगर पालिका परिषद को डर है कि कहीं उनके हिस्से का पानी नजदीकी यूपी के लोग चुरा न ले जाएं इसलिए गार्डों की तैनाती की गई है।


ऐसा इसलिए क्योंकी देश में सूखे के कारण मरने वाले किसानों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। आए दिन सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड से किसानों के मरने की खबरे आती रहती हैं। ऐसे में लोग पानी के लिए यहां से वहां जाते रहते हैं।


बुंदेलखंड क्षेत्र में इस बार मात्र 473.6 मिमी बारिश हुई जबकि औसतन बारिश का स्तर 995 मिमी है। कम बारिश के कारण यहां लगातार सूखे के हालात बने हुए हैं और लोग पीने के पानी के लिए भी तरस रहे हैं। ऐसे में टीकमगढ़ नगर पालिका परिषद को डर रहता है कि वहां के लोग इलाके की नहर से पानी ना चुरा लें। इसीलिए इस नहर के पास हमेशा हथियारबंद गार्डस की तैनाती रहती है।


टीकमगढ़ नगर पालिका परिषद की अध्यक्ष और बीजेपी की लक्ष्मी गिरी गोस्वामी ने बताया कि वो इस नहर की सुरक्षा के लिए लगाए गए गार्डस को सैलरी का भुगतान अपने खर्चे पर कर रही हैं। जिला कलेक्टर ने यूपी के ललितपुर के जिलाधिकारी से इस संबंध में बात की थी कि यूपी के किसान नदी से पानी नहीं निकाल सकें लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया।


ऐसे में हमारे पास अपने पानी के स्रोत को बचाने के अलावा कोई चारा नहीं है। अगर पानी के स्रोत पर पहरा बना रहता है तो यह पानी छह महीने के लिए हमारे कस्बे की जरूरतें पूरी कर सकता है।


टीकमगढ़ की आबादी 90 हजार के करीब है जो 27 वार्ड में बंटी हुई है। इनमें से आधे से ज्यादा वार्ड में नगर पालिका की ओर से दो दिन में एक बार पानी सप्लाई किया जाता है। जबकि बाकी वार्डों को तीन दिन में एक बार ही पानी नसीब हो पाता है।


पानी की आपूर्ति कस्बे से पांच किलोमीटर दूर जैमिनी नदी पर बने बांध से होती है। जिससे पानी यूपी-एमपी बार्डर पर बने राजघाट बांध को जाता है। हथियारबंद गार्ड बांध के एक किलोमीटर लंबे क्षेत्र में देर रात तक पहरेदारी करते हैं।


पालिका परिषद की तरफ से गार्डों की यह व्यवस्थाब बीते दो महीने से तब से की गई है, जब से फसलों की सिं चाई शु्रू हुई है। बता दें कि बुंदेलखंड में बीते तीन साल से किसानों को सूखे का सामना करना पड़ रहा है। इसके चलते उनकी फसलें प्रभावित हो रही हैं और निराश किसान खुदकुशी जैसे कदम उठा रहे हैं।


लेकिन सरकारों को उनकी कोई सुध ही नहीं है। वहीं ग्रामीण विकास विभाग के अतिरिक्त सचिव अरुण शर्मा ने बताया कि प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल सप्लाई के लिए बजट की व्यवस्थाि की जा रही है।
इंजी. अनिल यादव

16/12/2015

"नमस्कार !! मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूँ ? " उसके मोबाइल के स्पीकर पर कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव का मीठा स्वर गूँजा। उसने मोबाइल अपने और करीब कर लिया।

"जी मै आपकी क्या मदद कर सकती हूँ..?" स्वर पुनः उभरा।

"करने को तो बहुत कुछ कर सकती हैं पर... !" थोड़ी देर के लिए दूसरी तरफ़ सन्नाटा छा गया ।

"जी प्रोडक्ट से सम्बंधित कोई सहायता या शिकायत यदि हो तो दर्ज कराएं ।" स्पीकर पर अब अधिक सधा हुआ स्वर सुनाई दिया ।

"अजी कभी एकान्त में मिलिये तो शिकवे भी हों, शिकायत भी... " उसे शगल करने की सूझी, उसके अंदर का जानवर जैसे जाग उठा।

"जी अवश्य.! आपकी पूरी सहायता की जायेगी। क्या मैं आपका नाम जान सकती हूँ ? " दूसरी तरफ़ का स्वर और अधिक संयत हो गया था, पर उसकी मिठास कम नहीं हुई थी।

"हम तो आशिक हैं ...!!" वह फुसफुसाया ...।

"अच्छा..!! तो फिर उनका भी नाम बता दीजिये जिनके आप आशिक हैं ? उनके बारे में जानकर आपकी इस बहन को अति-प्रसन्नता होगी।"

उस पार के स्वर में सन्तुलन के साथ मानो शहद का जादू था। वह अचानक अर्श से फर्श पर आ गिरा। अनायास ही उसकी आँखें मुँद गयीं।

दो चोटियोँ में पीला रिबन बाँधे, खनकती हँसी लिए एक मासूम छवि उसकी भीग आई आँखों में झलक आई। कटाक्ष था या आत्मीयता ? पर न जानें क्यों उसे इन शब्दों में यह अंतर ढूँढने का मन नही किया ।

"माफ कीजियेगा... " भर्राये गले से यही शब्द निकले। लेकिन तब तक लाइन कट गयी थी।

10/12/2015

वैसे तो माधोप्रसाद बडे विश्वविद्यालय के किसी श्रेष्ठ कोलेज के प्रोफेसर हैं । अच्छी खासी तनख्वाह है , प्रेम विवाह किया है सो वाइफ भी कमाऊ है । लेकिन उनके प्रेम विवाह का समाजशास्त्र तनिक अनोखा है। जब प्रेम करने की प्रक्रिया में थे तो उन्होंने ढंग से पता किया -ससुर के बारे में तो साफ हुआ कि ससुरे की बस दो बेटियाँ ही |लेकिन ससुरे ने ठीक ठाक दौलत इकट्ठी कार रखी है -मन ही मन मुस्कुराकर माधोप्रसाद ने अपने प्रेम को परवान चढाया । ससुर पर ठीक से दबाव बनाने के लिए पत्नी को उल्लू बना कर शादी के बाद भगाया । भाग्य का जुदा खेल - बिना किसी उठा पटक के सब मामला शांत हो गया । छः -सात साल पुरानी मारुती-८०० पड़ी हुई थी ससुरजी के पास बिना काम की , सो उन्होंने माधोप्रसाद पर कृपा करते हुए गिफ्ट किया । लेकिन माधोप्रसाद ठहरे कम्युनिस्ट सो दोस्तों से बताया कि ससुर से ख़रीदा है। खैर , इस बात के तो कई साल हो चले यानि ४-५ साल । ससुर ने पिछले साल खरीदी थी आई टेन। माधोप्रसाद की नींद साल भर उडी रही, मन बेचैन रहा कुछ जुगत सूझ ही नही रहा था कि किस तरह इस नए कार को हड़पे । वह बेचारी कार भी ससुरे के यहाँ इंटों पे खड़ी रहती, जालिम रिटायर्ड आदमी जाए तो कहाँ जाए ? माधोप्रसाद को दिन को चैन, न रात को नींद । उसने अपनी उस मुर्ख पत्नी को और अधिक मुर्ख बनाने का षड़यंत्र किया। जाकर उसने अपने बाप से कहा कि 'कार इन्हे दे दो आप तो कहीं आते जाते हो नहीं |'

पिता ने बेटी की बेवकूफी को समझते हुए कहा कि 'बेटे, ये कार तो कल ही चोपडा को बेच डाला - अब तो बस एक रास्ता है कि माधोजी पैसे का इनजाम करें तो चोपडा को कार न देकर तुम लोगों को ही दे दूँ । पैसा और कार दोनों घर में ही रह जाएगा । '

अच्छे दिखने की मज़बूरी में माधोप्रसाद को ससुर की कार का वाजिव से अधिक दाम देना पड़ा किश्तों में। शुरू में माधो ने सोचा कि थोड़ा सा पैसा देता हूँ और बाद में देने के नाम पर कार हड़पता हूँ। लेकिन ससुरा तो ससुरा ही निकला, कहा- 'माधोजी आपमें और मुझमे कोई फर्क तो है नहीं , दिक्कत तो चोपडा है , उसे कैसे समझाऊंगा ।'

कमीना माधोप्रसाद खेल तो सब समझता था ,पर बेचारा करे तो क्या करे! बाज़ार-भाव से ज्यादा पैसा भी देना पड़ा । आसपास यही बात फैली कि माधोप्रसाद झूठ बोल रहा है - 'ससुर कभी पैसा लेगा।'

वैसे माधोप्रसाद प्रोफेसर है और कम्युनिस्ट भी है , दहेज़ के सख्त खिलाफ हैं।

06/12/2015

अब एक बात तो तय हो गयी कि अब जो भी करना है वो इसी जन्म में करना है और भारत को विश्व गुरु बनने के अपने सपने को साकार होते हुए अपनी आँखों से देखना है ………
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मैंने अपने अंकल से कुछ प्रशन पूछे, जो मुझे बचपन से परेशान कर रहे थे :-
अंकल, आप पिछले जन्म में क्या थे ?,
उन्होंने कहा : पता नहीं।
अच्छा अंकल, आप अगले जन्म में क्या बनोगे ?,
उन्होंने कहा : पता नहीं।
मैंने पूछा :- अंकल कोई गरीब घर में और कोई अमीर घर में कैसे पैदा होता है ?
उन्होंने कहा :- इसका मुझे पता नहीं।
फिर मैंने पूछा :- कोई "ब्राह्मण" के यहाँ, कोई "छत्रिय" के यहाँ, कोई "वैश" के यहाँ कैसे पैदा होता है ? क्या इसके पीछे भी कोई Logic है ?
फिर उन्होंने कहा :- बेटा, पैदा तो इंसान कहीं भी हो सकता है, पर "ब्राह्मण", "छत्रिय", "वैश" बनता है अपने कर्मों के आधार पर.
मैंने पूछा :- कैसे ??
तो उन्होंने कहा :-
(a) जब हम ज्ञानवर्धक बातें करते है तो लोग हमें "ब्राह्मण" कहते हैं.
(b) जब हम अपनी रक्षा करते हैं तो लोग हमें "छत्रिय" कहते हैं.
(c) जब हम Business करते हैं तो लोग हमें "वैश" कहते हैं.
पुराने समय में ज्यादातर समय यह देखा जाता था कि "ब्राह्मण", "छत्रिय" और "वैश" के बच्चे अपने पारिवारिक पेशे को ही अपनाते थे और शादियां भी उसी तरीके से किया करते थे. पर अब समय बदल रहा है और इसी प्रकार हर कोई हर तरह का काम भी कर रहा है और शादियाँ भी कर रहा है. समय के साथ तो चलना ही चाहिए, पर अपने संस्कारों को बिना छोड़े हुए …
उनकी बातें सुन कर मेरे दिमाग में कुछ बातें उभरी, जिसे की हमें समय रहते हुए गहरी सोच और उससे भी ज्यादा गहरे चिंतन का विषय मानना चाहिए ?????
1) इसका मतलब क्या विश्व भर में हर एक व्यक्ति के अंदर "ब्राह्मण", "छत्रिय", "वैश" समाये हुए होते हैं ??
2) पुरे विश्व की किसी भी जाति हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई के भगवानों के नाम के आगे सरनेम(Caste) नहीं लिखा है, ऐसा क्योँ ?, क्या सन्देश देना चाहते थे हमारे वो सब भगवान ???
3) पिछले जन्म में या अगले जन्म में मैं क्या था या क्या बनूँगा, ये सोच कर अपना दिमाग ख़राब करने वाली बातें है ? यही सोच सोच कर Tension लेते रहो कि हम गरीब घर में पैदा हुए ? ज़बरदस्ती की Tension.....
(4) इन सब ऊपर की बातों से एक बात तो तय हो गयी कि अब जो भी करना है वो इसी जन्म में करना है, हमारे पास कोई option नहीं है.
मित्रों आज की तारीख में जितने भी लोग Top पर (ऊँचे पदों पर) हैं चाहे Service में, Business में,फिल्म Industry में या किसी अन्य जगहों पर, उनमें से अधिकतर लोग गरीब घरों में ही पैदा हुए थे.
(i) सबसे पहले उन्होंने जाना कि संस्कार हमारे अंदर कहाँ कहाँ से आते है :- (a) माता-पिता से (b) अपने आस पास के Environment से (c) अपनी Will Power (इच्छाशक्ति) से.
(ii) साथ ही उन्होंने जाना कि हमारे पैदाइशी Original संस्कार कौन कौन से होते हैं :- (a) शांति, (b) सुख (c) प्रेम, हर किसी से, (d) शक्ति, (e) ज्ञान, (f) पवित्रता और (g) आनंद।
और फिर इसके बाद उन्होंने point (i) और 4 (ii) में तड़का लगाया अपने जोश, जूनून और जज्बे का, जिससे की वो सभी लोग आज आसमान की उचाईयों पर हैं.
मित्रों हमें सोचना होगा कि हम इस "मैं गरीब हूँ, मैं कुछ नहीं कर सकता, मेरे पास कोई साधन नहीं है, मुझे कोई Opportunity नहीं मिली या कोई Opportunity नहीं देता " वाले अपने ऊपर लगे Lable को किसी भी हाल में हटाना होगा, जिससे कि हम सब लोग एक साथ मिल कर नदी की धारा में बिना किसी रुकावट के बहते हुए, अपना बूंद बूंद सहयोग दे कर, भारत को विश्व गुरु बनने के अपने सपने को साकार होते हुए अपनी आँखों से देखें।
A dream you dream alone is only a dream.
A dream you dream together is a reality.

18/11/2015

रेवती को आज रह -रह कर पुरानी बातें याद आ रही थीं.छोटे से दो कमरों के फ्लैट में वह अपना सामान रख रही थी .पर मन न जानें कहाँ कहाँ भटक रहा था .उनके बेटे हरित ने आज उन्हें ये दिन देखने को मज़बूर कर दिया था ....शहर की पॉश कालोनी में कितना सुन्दर घर था जिसे रेवती और हरीश नें सारी जिंदगी की कमाई से बनाया था .दोनों बच्चों को पढ़ा लिखा कर शादी करके अपने कर्तव्य पूरे कर लिए थे.अब बुढ़ापा भी बेटे के साथ कट जायेगा यही उम्मीद थी..बेटे बहू दूसरे शहर में रहते थे .कभी वे मिलने आते तो कभी ये लोग चले जाते .बाद में धीरे धीरे यह क्रम टूटने लगा .बच्चों के स्कूल ..पढाई आदि से समय कम मिलता .
हरित और मालती किराये के घर में रहते थे .एक तो छोटा घर फिर किराया और प्रति वर्ष किराया बढ़ना या मकान बदलना
उन्हें परेशानी में डाल देता .वे चाहते थे कि पिता जी अपने घर को बेच दें तो इस समस्या का हल निकल सकता है .मकान की कीमत तो अच्छी ही मिलेगी ..उससे चाहे तो माँ और पिता जी अपने लिए एक छोटा घर खरीद सकते हैं और हरित भी एक अच्छा घर ले सकता है .या माँ और पिता जी भी उन्हीं के साथ रह सकते हैं ....पर साथ रहने का विकल्प मालती को अच्छा नहीं लगा .
उन्होंने अपना प्रस्ताव हरीश और रेवती के पास कई बार रखा .पर हरीश को आपत्ति थी .उसका कहना था कि हरित चाहे तो मकान खरीद ले .वे जितनी हो सकेगी मदद कर देंगे बाकी किसी भी बैंक से क़र्ज़ लिया जा सकता है .इस घर के साथ उनकी बहुत सी भावनाएँ जुडी हुई हैं .फिर बनी बनाई प्रॉपर्टी तो अपना संचित धन ही है .ये तो सब उसी के लिए है .पहले बातों बातों में ये विषय कई बार उठा फिर ज़िद और बाद में बाप बेटे के बीच यह झगड़े का विषय बन गया .अब तो रिश्ते की डोर मानो मकान से ही बंधी रह सकती थी .फिर भी हरीश ने संतान की ख़ुशी का ध्यान रखने का निर्णय लिया.उन्होंने बेटे से दो एक साल की मोहलत सी माँगी .शायद तब तक वे पुत्र मोह और मकान के मोह में चुनाव कर सकें .इसी भरोसे के साथ उन्होंने सभी कागज़ -पत्र बेटे के हवाले कर दिए .
इस बात को लगभग एक साल बीत गया और कोई बात चीत भी नहीं हुई .हरीश और रेवती को ख़ुशी थी कि चलो बेटे ने उनकी बात रख ली .घर का क्या आज नहीं तो कल होना तो उसी का था .अब जी भर कर रह सकेंगे .
तभी अचानक एक दिन कुछ लोग मकान देखने आये और जाते समय उन्हें तीन दिन का समय दे गए कि मकान खाली होना चाहिए .वे एक महीने पूर्व इसे खरीद चुके हैं और अब यहाँ आना चाहते हैं .उन्होंने बेटे को फोन करने की बहुत कोशिश की .पर मिल नहीं रहा था .तब उसके ऑफिस से पता किया कि वे लोग सपरिवार छुट्टियाँ मनाने विदेश गए हैं ..कहाँ गए या कब आएँगे ? ये सूचना उनके पास भी नहीं थी .
जीवन में पहली बार हरीश को लगा कि वे कितने असहाय से हो गए हैं .बेटे ने पहले उन्हें बता तो दिया होता .अब कहाँ जाएँ और सामान कहाँ ले जाएँ .एक पूरा दिन निकल गया ..दो दिन में कहाँ घर ढूँढें और उनकी जमा पूँजी भी तो वे पहले ही उसे दे चुके थे .उन्होंने अब नए मालिक से दो दिन आउट हाउस में रहने की इज़ाज़त ली .
उनके अड़ोसी -पडोसी भी अचंभित थे पर कैसे मदद करें ?तभी न जाने किसने मीडिया को खबर कर दी .अब अख़बारों और टी.वी.पर ये खबर बन गयी .माँता पिता लोगों के सामने अभी भी बेटे को दोषी मानने को तैयार नहीं थे .
अचानक तीसरे दिन कोई उनसे मिलने आया .उसने कहा कि शहर की नई कॉलोनी में उनके लिए किराये पर मकान ले लिया गया है .वे उनके साथ चलें . छह महीने का किराया दिया जा चुका है .उन्होंने इसकी रसीद भी उन्हें दे दी .सच मकान उन्हीं के नाम से किराये पर दिया गया था ....अब हरित और रेवती फिर से धीरे धीरे अपनी गृहस्थी सँवार रहे थे .पर मन से नहीं.उन्हें बेटे का इंतजार था .

छह महीने बीतने को थे .हरित को किराये की चिंता थी ...मकान मालिक से भी अभी तक परिचय भी नहीं हुआ था .वह दूसरे शहर में रहता था .एक दिन रेवती और हरीश अपनी पुरानी बातों में खोये हुए थे .तभी एक महिला उनसे मिलने आई ...उसने अपना परिचय देते हुए कहा कि उसका नाम सविता है .यह उसी का घर है .वह जानना चाहती है यहाँ कोई कष्ट तो नहीं ?फिर बोली वैसे अब यह घर बेच दिया है मैंने .......बस इतना सुनते ही रेवती तो रोने ही लगी हरीश भी हडबडा उठे .'अरे !कब ? हमें कितना समय मिलेगा ? यूँ अचानक हम कहाँ जायेंगे ?नया मालिक हमें रखे या निकाल दे तो ?
सविता भी अचकचा गयी .उसे ये बात इस तरह नहीं करनी चाहिए थी ....रेवती के हाथ पकड़ कर उन्हें दिलासा देती हुई बोली .''ओह. .नहीं नहीं घबराने वाली कोई बात नहीं .दर असल जिन्होंने ये घर खरीदा है उन्हीं से मिलने आई थी ..लेन-देन पूरा करना था .मन हुआ एक बार अपना घर भी देख लूँ और आपसे मिल भी लूँ .यह आपके लिए ही खरीदा गया है .
हरीश और रेवती असमंजस में थे ....?आगंतुक ने मकान के कागज उन्हें दिए ...उनकी आँखें खुली की खुली ही रह गई सचमुच मकान तो उन्हीं के नाम पर ख़रीदा गया था .........मन में फिर पुत्र के प्रति प्रेम उमड़ने लगा ......रेवती बोली ..``मैं न कहती थी हरित ऐसा कर ही नहीं सकता....".वह एक दम खुश हो गयी .हरीश अभी भी सोच विचार में मग्न थे कागजों को देखकर .....किसने खरीदा और कब ?
तभी सविता उठते हुए बोली ..."चलती हूँ .पर आप लोगों से मिलकर मुझे आज बहुत ख़ुशी हुई ....आप धन्य हैं जिनकी अलका जैसी बेटी है ......उसने मुझे ये सब बताने से मना किया है ,पर मैं अपने मन को अब रोक नहीं सकती .वह मेरी सहेली है बहुत नाराज़ होगी मुझ पर...........बेटी होकर भी आपके प्रति अपना फ़र्ज़ बखूबी निभा रही है .वह जानती है कि सामने से आप यह सब नहीं स्वीकार करेंगे ......इसीलिए जब से मीडिया से पता चला ........वह सदा आप के साथ साए की तरह लगी हुई थी...... पर .....खैर ..अब चलूँ वह मेरी प्रतीक्षा में होगी .और तेज़ी से घर के बाहर दौड़ गयी ....
रेवती और हरीश तो इस बात से किंकर्तव्य विमूढ़ से खड़े रह गए .........आज उन्हें याद आई वह भूली बिसरी बेटी ..जिसे उन्होंने हमेशा दूसरा दर्ज़ा ही दिया ...... खेल -खिलौने ,खाना- पहनना ....पढाई हर जगह पहला हक हरित को ही मिला .बचपन में लडती झगडती भी थी इन बातों के लिए .फिर" बेटी होने यही हश्र होता है" शायद ...यह समझ कर वह निर्लिप्त सी होती चली गई .पढाई के बाद शादी कर दी गयी थी ...उसने भी फिर कभी न कोई शिकायत की न कोई उम्मीद रखी .माँ बाप भी ' बेटी अपने घर चली गई .'सोचकर उसकी ओर से निश्चिन्त हो गए ...कभी- कभार ही उसे याद किया करते .
और आज वही बेटी अपने फ़र्ज़ पे खरी उतरी वह भी बिन बोले... बिना किसी अपेक्षा के ......सविता की बात कि "आप धन्य हैं "उनके अंतर्मन को कुरेदती रही ...क्या वे उससे मिल पायेंगे पर कैसे ?दोनों के आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे .अब पुत्र-मोह भंग होने के बाद .

17/11/2015

एक छोटे से गाँव में भोलू नाम का एक गधा रहता था। वह गाँव बाकी दुनिया से बिलकुल कटा हुआ था, न वहां कोई आता था और न वहां से कोई कहीं जाता था।

एक बार गधे ने सोचा क्यों ना जंगल के उस पार जाकर देखा जाए कि आखिर उस तरफ है क्या?अगले दिन भोर में ही वह जंगल की ओर बढ़ चला।जंगल घना था और गधा मूर्ख। बिना सोचे समझे उसे जिधर मन करता उधर चल पड़ता। जैसे-तैसे करके उसने जंगल पार किया और दूसरी छोर पर स्थित एक और गाँव पहुँच गया।उधर गाँव में हल्ला मच गया कि भोलू गधा गाँव छोड़ कर चला गया है, सब बात करने लगे कि वो कितना भाग्यशाली है, और अब कितनी आराम की ज़िन्दगी जी रहा होगा। लोगों की बात सुनकर कुत्तों के एक झुण्ड ने भी जंगल पार करने का निश्चय किया।

अगली सुबह वह गधे की गंध का पीछा करते हुए उसी रास्ते से जंगल के उस पार चले गए।

फिर क्या था, गाँव के अन्य पशुओं में भी जंगल पार करने की होड़ सी लग गयी और सभी गधे द्वारा खोजे गए रास्ते पर चलते हुए जंगल पार करने लगे।

बार-बार उस रास्ते पर चलने से एक पगडण्डी सी बन गयी और कुछ सालों बाद इंसान भी उसी रास्ते को पकड़ कर जंगल पार करने लगे । समय बीतता गया और धीरे-धीरे गाँव की आबादी काफी बढ़ गयी। तब सरकार ने जंगल पार करने के लिए एक रोड बनाने का निर्णय लिया गया।

शहर से इंजीनियरों का एक दल आया और इलाके की स्टडी करने लगा।

गाँव वालों ने बताया कि जंगल पार करने के लिए एक पगडण्डी बनी हुई है उसी पर अगर रोड बना दी जाए तो अच्छा रहेगा।

उनकी बात सुनकर चीफ इंजीनियर थोडा मुस्कुराया और बोला, “ क्या मैं जान सकता हूँ ये पगडण्डी किसने बनायी ?”

गाँव के एक बुजुर्ग बोले, “जहाँ तक मुझे पता है ये रास्ता किसी गधे ने खोजा था !”, और उसने पूरी कहानी कह सुनाई ।

उनकी बात सुनने के बाद चीफ इंजीनियर बोले, “मुझे यकीन नहीं होता कि आप सब इंसान होंते हुए भी इतने सालों से एक गधे के बनाये रास्ते पर चल रहे थे…पता है ये रास्ता कितना कठिन और लम्बा है जबकि हमने जो रास्ता खोजा है वो इसका एक चौथाई भी नहीं है और उसे पार करना भी कहीं आसान है। ”

आज गाँव वालों को अपनी गलती का एहसास हो रहा था, वे सोच रहे थे कि काश उन्होंने एक नया रास्ता खोजने का प्रयास किया होता!

दोस्तों, जो गलती उन गाँव वालों ने की कहीं वही गलती हम भी तो नहीं कर रहे हैं? कहीं हम किसी गधे के दिखाए रास्ते पर चल कर अपनी life बर्वाद तो नहीं कर रहे हैं? क्या आज हम जो भी काम या पढाई कर रहे हैं वो हमारे अपने interest के मुताबिक है या बस समाज और घरवालों के दबाव में हम अपना रास्ता ढूँढने से हिचक रहे हैं? कहीं हमें भी अपना रास्ता खोजने की ज़रुरुँत तो नहीं?

अगर हमे एक meaningful life जीनी है तो हमें इन प्रश्नों का उत्तर देना होगा, वरना उस इंजीनियर की तरह एक दिन हमें भी कोई मिलेगा और बताएगा कि हमने अपनी पूरी ज़िन्दगी एक गधे का रास्ता पकड़े-पकड़े बर्वाद कर दी।

12/11/2015

प्रोफेसर साहब 2 साल से लगातार अपने किराये वाले कमरे से कॉलेज तक का सफ़र तय कर रहे हैं ।उनकी उम्र अभी उतनी ज्यादा भी नहीं थी कि अनुभवों का भण्डार हों लेकिन उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा ने बच्चों को उनका प्रसंशक बना दिया था।उनका अपने घर से कॉलेज तक का सफ़र यूँ ही जारी था।कॉलेज तक आने - जाने का जरिया आगरा की जे.एन.यूं.आर.एम्.की बसें थी।बस में अब उन्हें दो दोस्त मिल गए थे।एक थे डॉक्टर साहब और एक थे बैंक मेनेजर साहब। मेनेजर साहब को वो लड्डू सर बुलाने लगे थे हालाँकि दोनों ही उम्र में प्रोफ़ेसर साहब से बड़े थे।

सफ़र का अकेलापन कभी - कभी ऐसे लोगों को करीब ले आता है जो दूर -दूर तक कोई वास्ता नहीं रखते।ऐसा ही कुछ हुआ था इन तीनों के साथ ।तीनों रास्ते में मिलते और ठिकाना होती वही जे.एन.यूं.आर.एम्.की बसें।
प्रोफ़ेसर साहब बड़े गुरुर से अब एक की जगह तीन सीट पर धाक ज़माने लगे थे । 2 सीट वे मेनेजर और डॉक्टर साहब के लिए रखते। ये अब नियम बन गया था।कितनी बार लोगों से भिड़ंत भी हुयी ... जाहिर है, बात गलत थी ... किसी के आने से पहले उसकी सीट रखना !!! पर दोनों उम्र दराज लोग थे तो प्रोफेसर साहब इसका ख्याल कभी नहीं भूलते।

नए साल के साथ डॉक्टर साहब का जन्मदिन आने वाला था ... प्रोफेसर ने सोचा मैं उन्हें क्या दूँ .? तो साहब फूल लेकर पहुँचे ... फूल का गुलदस्ता देते हुए प्रोफेसर साहब बोले ...
सर " कितना प्यार भरा है इस दुनिया में ...हम तीनों को देखिये।डॉक्टर साहब ने जबाब में सख्त लहजे से कहा ...
" कोई प्यार व्यार नहीं बेटा ... दुनिया मतलबी है "
जबाब में प्रोफेसर साहब कुछ कहते तब तक कॉलेज आ गया था।वो क्लासरूम में तो पहुंचे मगर निराशा लिए...सोचा डॉक्टर साहब उम्र में अधिक अनुभवी हैं तो ये भी ठीक कहा होगा।
..अब से किसी को प्यार नहीं करूँगा ...

क्लासरूम में बच्चों से ज्यादा बात नहीं की ।लेकिन सर के मूड को बच्चों ने भांप लिया था । कई बार पूछने पर भी जबाब नहीं आया ...
देर शाम बस की भीड़भाड़ से होकर प्रोफेसर अपने कमरे तक आ पहुँचे।एक ही दिन में कितनी उदासियों ने मन में घर कर लिया था। चुपचाप गुमसुम से वो बिस्तर पर यूँ ही सो गये। मन ने ठान लिया था अब से किसी को प्यार नहीं करूँगा।
अगली सुबह फिर बस से सफ़र तय किया..पर इस बार उनकी सीट के पास वाली सीट पर लोग बैठे जा रहे थे।और वो खामोश बैठे रहे ... उन्होंने कोई सीट नहीं बचाई।

कुछ दिन बाद प्रोफ़ेसर साहब बैंक के सामने बस का इन्तजार कर रहे थे कि अचानक बारिश हुयी ।ये तो वही बैंक था जहाँ "लड्डू सर" काम करते थे।यानि बैंक मेनेजर साहब...
मन अंदर जाने से हिचक रहा था ,ना जाने कैसा बर्ताव हो ? पर फिर भी प्रोफेसर साहब अंदर चलर गए।
मेनेजर साहब की जैसे ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।मेनेजर साहब उन्हें रूम में गए , बैठाया ,चाय पिलाई और अलमारी से कलेंडर निकालकर दिया ।ये वही कलेंडर था जो मैनजर साहब ने छुपाकर रखा था ताकि वो प्रोफ़ेसर साहब को दे सकें ।
ये सब कुछ तब हो रहा था जब मेनेजर के ऊपर बैंक के काम का बोझ था । लेकिन उन्होंने प्रोफ़ेसर साहब की अनदेखी नहीं की।उन्हें सम्मान दिया।
इस बात ने तो जैसे प्रोफ़ेसर के अंदर नयी ऊर्जा भर दी थी...
घर पहुँचते ही उन्होंने डॉक्टर साहब को मेसेज लिखा ...
"
डिअर डॉक्टर साहब ... मैं जो रोज आपके लिए बस की सीट बचाता था , आते- जाते रोज आपके क्लीनिक को देखता था । मेनेजर साहब ने मेरे लिए जो कलेंडर छुपाकर रखा था.. ये क्या था ??? शायद प्यार ही था ... "बिना स्वार्थ वाला ...ये दुनिया प्यार से भरी है।
:-)

10/11/2015

हम सब जानते हैं कि भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। आज भारत में दूसरे देशों से सबसे ज्यादा युवा बसते हैं। युवा वर्ग वह वर्ग होता है जिसमें 14 वर्ष से लेकर 40 वर्ष तक के लोग शामिल होते हैं।
आज भारत देश में इस आयु के लोग सबसे बड़ी संख्या में मौजूद है। यह एक ऐसा वर्ग है जो शारीरिक एवं मानसिक रूप से सबसे ज्यादा ताकतवर है। जो देश और अपने परिवार के विकास के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं। आज भारत देश में 75% युवा पढ़ना लिखना जानता है।
आज भारत ने अन्य देशों की तुलना में अच्छी खासी प्रगति की है। इसमें सबसे बड़ा योगदान शिक्षा का है। आज भारत का हर युवा अच्छी से अच्छी शिक्षा पा रहा है।
उन्हें पर्याप्त रोजगार के अवसर मिल रहे हैं परंतु दुख की बात यह है कि आज का युवा भले ही कितना ही पढ़ लिख गया हो परंतु अपने संस्कार व देश और परिवार के प्रति जिम्मेदारियों को दिन-प्रतिदिन भूलता ही जा रहा है।
आज भारत का युवा वर्ग ऊंचाईयों को छूना चाहता है परंतु वह यह भूलता जा रहा है कि उन ऊंचाईयों को छूने के लिए वह स्वयं अपनी जड़ें खुद काट रहा है।
भारत का युवा वर्ग तैयार है एक नई युवा क्रांति के लिए। लेकिन अफसोस की बात है कि कुछ इस युवा वर्ग को रोक रही हैं। भारत का युवा वर्ग भारत में अपना योगदान देने की बजाय विदेशों में जाकर बस जाता है।
भारत की राजनीति में आज वृद्ध लोगों का ही बोलबाला है और चंद गिने-चुने युवा ही राजनीति में है। इसका एक कारण यह है कि भारत में राजनीति का माहौल दिन-ब-दिन बिगड़ रहा है और सच्चे राजनीतिक लोगों की जगह सत्तालोलुप और धन के लालची लोगो ने ले ली है।
राजनीति में देश प्रेम की भावना की जगह परिवारवाद, जातिवाद और संप्रदाय ने ले ली है। आए दिन जिस तरह से नेताओं के भ्रष्टाचार के किस्से बाहर आ रहे है देश के युवा वर्ग में राजनीति के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है।
अब भारत की राजनीति में सुभाषचन्द्र बोस, शहीद भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, लोकमान्य तिलक जैसे युवा नेता आज नहीं है। जो अपने होश और जोश से युवा वर्ग के मन में एक नई क्रांति का संचार कर सके। लेकिन अफसोस आजादी के बाद नसीब में है यह बूढ़े नेता जो खुद की हिफाजत ठीक से नहीं कर सकते तो युवा को क्या देशभक्ति या क्रांति की बातें सिखाएंगे?
यही वजह है कि भारत के युवा अब इस देश को अपना न समझकर दूसरे देशो में अपना आशियाना खोज रहे हैं। वे यहां की राजनीतिक सत्ता और फैले हुए भ्रष्टाचार से दूर होना चाहते हैं। इसलिए वे कोई भी ठोस कदम उठाने से पहले कई-कई बार सोचते हैं। यहां तक कि भारत में वोट डालने वाले युवा को अपने चुने हुए उम्मीदवार पर तक भरोसा नहीं होता है।
जिम्मेदारी का अहसास क्यों नहीं :
आज के युवाओं को सिर्फ और सिर्फ टारगेट ओरियेंटेड बना दिया गया है मतलब यह है कि आजकल के माता-पिता स्वंय नहीं चाहते कि उनका पुत्र या पुत्री अपने कार्यो के अलावा देश के सामाजिक कार्यो में भी अपना योगदान दें क्योंकि आजकल का माहौल ही कुछ इस तरह का हो गया है कि सब केवल अपना भविष्य बनाने में लगे हुए हैं।
यहां तक कि आजकल के युवाओं को उनके परिवार के प्रति जिम्मेदारी का एहसास तक नहीं होता इसलिए हमें इसके लिए कई ठोस कदम उठाने होंगे।
निष्कर्ष :
आज भारत का हर नागरिक भली-भांति अपना अच्छा बुरा समझता है। युवाओं को संप्रदायवाद तथा राजनीति से परे अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा। युवाओं को इस मामले में एकदम सोच समझकर आगे बढ़ना होगा। और ऐसी किसी भी भावना में न बहकर सोच समझकर निर्णय लेना होगा।
भारत का युवा वर्ग वाकई में समझदार है जो सच में इस मामले में एक है और ज्यादातर युवावर्ग राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मान रहा है। यह वाकई में एक अच्छी और सकारात्मक बात है जो भारत जैसे देश के लिए बड़ी बात है।
और भी चीजें है जैसे बेरोजगारी, सरकारी नौकरियों में जगह पाने की लिए रिश्वत जैसी बातें भी कारण है युवा को देश से दूर करने के लिए। इसीलिए हमें समय-समय पर अपने युवाओं का मार्गदर्शन करना होगा। जिससे कि वे सही और गलत में पहचान कर सकें तथा अपने देश को आगे तथा तरक्की के मार्ग पर ले जाने में सहयोग प्रदान कर सकें।- इंजी. अनिल कुमार

09/11/2015

एक लड़का और एक लड़की
बहुत. प्यार करते थे
हालातो की वजह से लड़की की
शादी किसी और से हो जाती है
बरसो बाद वो एक दूसरे को मिलते है,
तो
-लड़के ने कहा
-----------◘
तेरी मोहब्बत में बीता हर एक पल
आज भी मुझे याद आता है
मैंने तो तुझे भूलना चाहा पर ये दिल
भूल ना पता है।
वो मेरे कन्धे पे सर रखकर तेरा
हँसना याद आता है,
वो मेरे गले लगकर घण्टो तेरा रोना
याद आता है।
वो घण्टो मेरे सीने पे सर रख कर तेरा सोना
याद आता है,
वो मुझपे तेरा हक़ जाताना बेमतलब लड़ जाना
याद आता है।
वो रूठना और मानना तेरा दिल
को बहुत याद आता है,
यूँ तो कोई कमी नहीं जीवन में गम
का साया भी नजर ना आता है।
सब कुछ है पास मेरे पर,प्यार
का कतरा भी नजर ना आता है।
लड़की बोली
◘---------
तनहा तो मै भी हूँ तेरे बिन पर किसी
से कुछ नहीं कहती हूँ,
औरो की इज़्ज़त की खातिर सब कुछ
घुट घुट कर सहती हूँ ।
ऐसा एक दिन नहीं जाता जब मै खुद से
ये नहीं कहती हूँ,
मेरा प्यार तो बस एक तुम थे तुम मेरे
दिल में रहते हो
मै तुम्हारे दिल में रहती हूँ
तुम्हारे तस्वीरो से मै अब भी बाते
करती रहती हूँ,
जब दर्द हद से बढ़ जाता है
तो घण्टो रोती रहती हूँ।
बस घरवालो की इज़्ज़त की खातिर
मैंने ये कदम उठाया था,
पर क्या हासिल हुआ चार ज़िंदगियाँ
तबाह करके मै अक्सर सोचती रहती हूँ।
ना तुम खुश हो ना मै खुश हूँ
ना वो खुश जिन्हे हमने अपनाया,
ये कैसा मिलन है और कैसा है
ये बन्धन मै अक्सर सोचती रहती हूँ।

09/11/2015

Safalta Kadam Chumti rahe,
Khushi Aaspas ghumti rahe,
Yash Itna faile ki KASTURI Sharma Jaye,
Laxmi ki kripa itni ho ki BALAJI bhi dekhte rah jaye
happy dhan teras to you and your family

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951 Premnagar, Shikohabad
Firozabad
283203

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