Rameej Raja

Rameej Raja DS "International Humanity Society" खौफ़ खुदा से...नफरत गुनाह से...मोहब्बत मुस्तफ़ा(स अ व) से ....

उमर सेंट जोसेफ़ इलाहाबाद टॉपर उसके बाद एमिटी यूनिवर्सिटी में उसका ज़िक्र प्रोफ़ेसर्स तक तारीफ़ क्या मुसलमान क्या हिंदू स...
09/08/2026

उमर सेंट जोसेफ़ इलाहाबाद टॉपर उसके बाद एमिटी यूनिवर्सिटी में उसका ज़िक्र प्रोफ़ेसर्स तक तारीफ़ क्या मुसलमान क्या हिंदू सब दीवाने। उसके बाद काल कोठरी का सफ़र सब महदूद चारदीवारी के भीतर लेकिन उसने पढ़ना नहीं छोड़ा अबान या कोई और दोनों भाइयों से जब भी मिलने जेल जाते तो एक दो किताबें जरूर साथ जाती थी हर मिलाई का था यह नियम था किताबें कार में अबान के मिली वो संदेश तमाचा है, उनके लिए जो नए नए नैरेटिव गढ़ रहे हैं, सब गिद्धों की ज़ुबान बंद कर दी जो फ़िराक़ में थे गलती करें हम लपकें।।

नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाना उफ़्फ़ कितना कलेजा चाहिए किसी अपने का फिर ढंग से खड़े नहीं हो पाते उसने भाई को विदा किया क़ब्र पर खड़े ही दोनों भाइयों को गले लगाया हिम्मत दी चचेरे भाई मासूम बच्चे को गोदी में उठाकर चूमा सीने से लगाया उमर ने बड़ा होने का फर्ज़ अदा किया भीड़ को समझाते रहे और आख़िर में लौट गए सलाखों के पीछे लेकिन यह बच्चे कितने मैच्योर हैं, कितना सब्र है, यह महसूस हुआ, बड़ा बेटा बाप की गैरमौजूदगी में बाप का फर्ज़ निभाता है। अल्लाह सलामत रखे।।

एक महान सूफ़ी संत की आखिरी ख्वाहिश की अज़ीब शर्तों :हकीकत में यह सुल्तान इल्तुतमिश ही थे जिन्होंने हजरत कुतुबुद्दीन बख्त...
06/08/2026

एक महान सूफ़ी संत की आखिरी ख्वाहिश की अज़ीब शर्तों :
हकीकत में यह सुल्तान इल्तुतमिश ही थे जिन्होंने हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की नमाज़-ए-जनाज़ा की इमामत की थी, क्योंकि सिर्फ वही उन शर्तों को पूरा कर सकते थे जो संत ने खुद उनके लिए तय की थीं, और मुझे पूरा यकीन है कि उस वली (संत) को इस बात का इल्म था।

शर्तें ये थीं:

​वह शख्स जो पहली तकबीर (अल्लाहू अकबर पुकारे जाने पर) के साथ जमाअत की नमाज़ में शामिल होता हो।

​जिसने कभी अपनी तहज्जुद की नमाज़ (आधी रात के बाद की नफ़्ल नमाज़) न छोड़ी हो।

​जिसने कभी किसी ग़ैर-महरम (वह शख्स जिससे निकाह जायज़ हो) को उस रिश्ते के अलावा न देखा हो जैसा कुरान में मुकर्रर (तय) किया गया है।

​वह इतना परहेजगार हो कि उसने कभी सुन्नत (नबी के बताए तरीके) नमाज़ न छोड़ी हो, खासकर अस्र (दोपहर की लाज़मी नमाज़) से पहले।

​जब ये शर्तें पढ़कर सुनाई गईं, तो वहाँ सन्नाटा छा गया। भला कौन इन कड़े उसूलों पर अमल कर सकता था? किसने अपनी ईमान की खातिर ऐसे अहकाम (नियमों) का पालन किया? तब सुल्तान आगे आए और उनकी रियासत ने उनके तकवे (परहेजगारी) की गहराई को महसूस किया।

#दिल्ली #भारतीय #इतिहास


04/08/2026

कुतुबुद्दीन ऐबक के बारे में बचपन में एक कहानी पढी थी. वो शिकार खेल रहा था, तीर चलाया और जब शिकार के नज़दीक गया तो देखा कि एक किशोर उसके तीर से घायल गिरा पड़ा है.
कुछ ही पल में उस घायल किशोर की मौत हो जाती है. पता करने पर मालूम हुआ कि वह पास के ही एक गाँव में रहनेवाली वृद्धा का एकमात्र सहारा था और जंगल से लकड़ियाँ चुन कर बेचता और जो मिलता उसी से अपना और अपनी माँ का पेट भरता था.
कुतुबुद्दीन उसकी माँ के पास गया, बताया कि उसके तीर से गलती से उसके बेटे की मौत हो गयी है.
माँ रोते रोते बेहोश हो गयी.
फिर कुतुबुद्दीन ने खुद को क़ाज़ी के हवाले किया और अपना ज़ुर्म बताते हुए अपने खिलाफ मुकद्दमा चलाने की अर्ज़ी दी.
क़ाज़ी ने मुकदमा शुरू किया . मृतक की बूढ़ी माँ को अदालत में बुलाया और कहा कि तुम जो सज़ा कहोगी वही सज़ा इस मुज़रिम को दी जायेगी.
वृद्धा ने कहा कि ऐसा बादशाह फिर कहाँ मिलेगा जो अपनी ही सल्तनत में अपने खिलाफ ही मुकदमा चलवाए और उस गलती के लिए जो उसने जानबूझ कर नहीं की .
आज से कुतुबुद्दीन ही मेरा बेटा है . मैं इसे माफी देती हूँ.
क़ाज़ी ने कुतुबुद्दीन को बरी किया और कहा -....... " अगर तुमने अदालत में ज़रा भी अपनी बादशाहत दिखाई होती तो मैं तुम्हें उस बुढ़िया के हवाले न करके खुद ही सख्त सज़ा देता ."..... इस पर कुतुबुद्दीन ने अपनी कमर से खंज़र निकाल कर क़ाज़ी को दिखाते हुए कहा -........ " अगर तुमने मुझसे मुज़रिम की तरह व्यवहार न करके ज़रा भी मेरी बादशाहत का ख़याल किया होता तो मैं तुम्हें इसी खंज़र से मौत के घाट उतार देता."
ये है असल बादशाहत और ये है असल इन्साफ ।

⚔️ मौलवी अलाउद्दीन (1794–1884)🇮🇳 1857 के महान क्रांतिकारीमौलवी अलाउद्दीन दक्षिण भारत, विशेषकर हैदराबाद में 1857 के स्वतं...
03/08/2026

⚔️ मौलवी अलाउद्दीन (1794–1884)

🇮🇳 1857 के महान क्रांतिकारी

मौलवी अलाउद्दीन दक्षिण भारत, विशेषकर हैदराबाद में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर विद्रोह किया और जीवनभर अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे।

✅ हैदराबाद में 1857 के विद्रोह के प्रमुख नेता।

✅ ब्रिटिश रेजीडेंसी पर हमले के प्रमुख क्रांतिकारियों में शामिल।

✅ अंग्रेजों के खिलाफ जनजागरण और संगठन का कार्य किया।

✅ काला पानी की कठोर सजा झेलकर भी संघर्ष की भावना को जीवित रखा।

✅ दक्षिण भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के महत्वपूर्ण नायक।

"मौलवी अलाउद्दीन ने मरते दम तक काला पानी की यातनाएँ झेलीं, लेकिन अंग्रेजों के सामने झुककर माफी नहीं माँगी।"

29/07/2026

"अमर शहीद अशफ़ाक़ उल्ला खान"

जब काकोरी कांड के बाद अंग्रेजों की आँख में धूल झोंककर हमारे क्रांतिकारी इधर-उधर छिपे थे, तब की एक ऐसी कहानी है जो दिल को झकझोर कर रख देती है।
अशफाक उल्ला खान पुलिस से बचते- बचते उत्तर प्रदेश और बिहार के रास्तों से होते हुए दिल्ली जा पहुंचे थे। उनका मकसद किसी तरह देश से बाहर (रूस या अन्य सुरक्षित ठिकाने) निकलकर आगे की आज़ादी की लड़ाई को जारी रखना था। दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने अपने एक पुराने स्कूल के साथी और परिचित मित्र से संपर्क किया—एक ऐसा इंसान जिस पर उन्हें अपनी जान से भी ज्यादा भरोसा था।
लेकिन अफ़सोस, अंग्रेजों के इनाम और लालच के आगे वो पुराना दोस्त टूट गया। उसने गद्दारी की और चुपचाप पुलिस को खबर दे दी। 7 दिसंबर 1926 की सुबह जब पुलिस ने उस मकान को चारों तरफ से घेर लिया, तब अशफाक पूरी तरह निहत्थे थे और अपनी गहरी नींद में थे। पुलिस ने दरवाजा खटखटाया और जैसे ही दरवाजा खुला, अंग्रेजों ने उन्हें दबोच लिया।
इस पूरे वाकये का सबसे मार्मिक और सच्चा पहलू यह है कि जब वे फैजाबाद जेल में थे, तो उन्होंने अपनी डायरी और आत्मकथा में इस धोखे का बिना किसी कड़वाहट के जिक्र किया। उन्होंने साफ-साफ लिखा कि उन्हें अंग्रेजों की ताकत ने नहीं, बल्कि अपने ही किसी करीबी के विश्वासघात ने हरवाया है। हालांकि, इस खुलासे के बाद भी उनके चेहरे पर कोई शिकन या देश के प्रति लक्ष्य से भटकाव नहीं था। जेल की उस तन्हाई में उन्होंने अपना सारा वक्त कुरान शरीफ की, इबादत और देश के नाम अपने आखिरी खत और पंक्तियां लिखने में बिताया।
ऐसी कुर्बानियों को याद करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जिस आजाद देश में आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उसकी कीमत इन महान सपूतों ने अपनी जान देकर चुकाई है।

⚠️डिस्क्लेमर:
यह पोस्ट पूरी तरह से ऐतिहासिक दस्तावेजों, काकोरी षड्यंत्र केस के अदालती ट्रायल रिकॉर्ड्स, पुलिस फाइलों और खुद शहीद अशफाक उल्ला खान द्वारा जेल में लिखी गई आत्मकथा व पत्रों पर आधारित है। इसका उद्देश्य महान क्रांतिकारी के जीवन संघर्ष के ऐतिहासिक तथ्यों को पाठकों तक पहुँचाना है।

29/07/2026

Dastaar Ke Har Taar Ki Tahqeeq Hai Lazim,
Har Sahib-e-Dastaar Muaz'zaz Nahi Hota !

1980 का मुरादाबाद नरसंहार: आज़ाद भारत का वो काला अध्याय, जिसे इतिहास से मिटाने की कोशिश की गई! आज जब मीडिया की तटस्थता औ...
28/07/2026

1980 का मुरादाबाद नरसंहार: आज़ाद भारत का वो काला अध्याय, जिसे इतिहास से मिटाने की कोशिश की गई! आज जब मीडिया की तटस्थता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो हमें 13 अगस्त 1980 के मुरादाबाद नरसंहार के उस दौर को भी याद करने की ज़रूरत है, जब सत्ता की गोद में बैठी पत्रकारिता ने एक खुली बर्बरता पर पर्दा डालने का काम किया था।

ईदगाह में ईद की नमाज़ अदा कर रहे लगभग 40,000 निहत्थे मुसलमानों पर जब गोलियाँ बरसाई गईं, तो वह कोई आम "हिंदू-मुस्लिम दंगा" नहीं था। जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर ने अपनी किताब 'राइट आफ्टर राइट' में लिखा है — यह सुरक्षा बलों और प्रशासन द्वारा अपने ही नागरिकों पर किया गया एक सुनियोजित नरसंहार था, जिसे बाद में दंगों की शक्ल देकर दबा दिया गया।

इसी घटना को दिवंगत सांसद सैय्यद शहाबुद्दीन साहब ने "आज़ाद भारत का जलियांवाला बाग़" कहा था।

मीडिया और सत्ता का दोहरा रवैया:
दलाली और बैलेंसिंग एक्ट: उस दौर के हिंदी और अंग्रेज़ी मीडिया ने सुरक्षा बलों के इस सांप्रदायिक रवैये पर सवाल उठाने के बजाय इसे "दंगे" का नाम दिया और प्रशासन को क्लीन चिट बांटी।

वामपंथी और लिबरल बौद्धिक वर्ग: रोमेश थापर जैसे पत्रकारों और कथित वामपंथी विचारकों ने उल्टा कसूरवार पीड़ित समुदाय को ही ठहराया। आज जब यही वर्ग मानवाधिकारों की बात करता है, तो उनका दोहरापन साफ़ नज़र आता है।

राजनीतिक असंवेदनशीलता: तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने और दोषियों को सजा देने के बजाय इसके पीछे "पाकिस्तान का हाथ" बताकर पल्ला झाड़ लिया था।

लोकतांत्रिक देश में जब रक्षक ही भक्षक बन जाएँ और मीडिया सच को दबाने में लग जाए, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी साख खो देता है। मुरादाबाद का यह ज़ख़्म इतिहास के पन्नों में दर्ज़ है और यह याद दिलाता है कि बिना निष्पक्ष न्याय और सत्य के कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।

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The Father of Algebra इतिहास के पन्नों से: वह अंदलुसी गणितज्ञ जिसने अलजेब्रा में x, y, + , - जैसे संकेतों (Mathematical ...
26/07/2026

The Father of Algebra
इतिहास के पन्नों से: वह अंदलुसी गणितज्ञ जिसने अलजेब्रा में x, y, + , - जैसे संकेतों (Mathematical Symbols) की शुरुआत की!क्या आप जानते हैं कि सदियों पहले गणित के समीकरण (Equations) शब्दों में लंबे-लंबे पैराग्राफ की तरह लिखे जाते थे?

सोचिए, अगर x + y = z लिखने के लिए आपको हर बार पूरा वाक्य लिखना पड़े तो कितना मुश्किल होगा! इस मुश्किल को आसान बनाया 15वीं सदी के महान स्पैनिश-मुस्लिम गणितज्ञ अबू अल-हसन इब्न अली अल-क़लसादी (Al-Qalasadi) ने!
स्पेन के बाज़ा (Baza, Andalusia) शहर में जन्मे अल-क़लसादी ने गणित की दुनिया में सबसे बड़ा क्रांतिकारी बदलाव लाया—बीजगणितीय प्रतीक (Algebraic Notation)!

अल-क़लसादी और उनके अविष्कारों के बारे में खास बातें:
गणितीय प्रतीकों के जनक: अल-क़लसादी इतिहास के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने शब्दों की जगह प्रतीकों (Symbols) का व्यवस्थित इस्तेमाल किया:
जोड़ (+): के लिए अरबी अक्षर 'वा' (و)
बराबर (=): के लिए 'लैम' (ل)
अज्ञात राशि (x): के लिए 'शीन' (ش - 'शाय' यानी वस्तु से)
वर्ग (x^2): के लिए 'एम' (मुरब्बा से)
वर्गमूल (\sqrt{\quad}): के लिए 'जिम' (जज़्र से)

'कश्फ़ अल-असरार' (Kashf al-Asrar): उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब 'कश्फ़ अल-असरार अन इल्म हुरुफ़ अल-गुबार' थी, जिसने पूरे उत्तरी अफ्रीका और यूरोप में गणित पढ़ाने के तरीके को बदलकर रख दिया।

वर्गमूल (Square Root) निकालने का तरीका: उन्होंने अपरिमेय संख्याओं (Irrational Numbers) के वर्गमूल का अनुमान लगाने के लिए बेहद सटीक गणितीय सूत्र (Successive Approximations) विकसित किए।

व्यावहारिक गणित: उन्होंने गणित को सिर्फ सिद्धांतों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि व्यापार, उत्तराधिकार (Inheritance/Fara'id) और संपत्ति के बंटवारे जैसे व्यावहारिक जीवन के कामों में इसका सरल इस्तेमाल सिखाया।

अल-क़लसादी का यह आविष्कार आज के आधुनिक गणित का आधार बना। उनके बिना आज का गणित इतना सरल और सुलभ नहीं होता!

08/07/2026

We are all in the gutter, but some of us are looking at the stars.
-Oscar Wilde✨

07/07/2026

Lion is the King of the jungle, but

Wolf never performs in circuses.

Be a wolf 🐺

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