Rameej Raja

Rameej Raja DS "International Humanity Society" खौफ़ खुदा से...नफरत गुनाह से...मोहब्बत मुस्तफ़ा(स अ व) से ....

11/06/2026

ज़हर का स्वाद उनसे नहीं पूछो....
जिन्होंने हमेशा साँपों को पाला हो।

भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खान ( स्वतंत्रता सेनानी) का आखिरी सफर। विभाजन के बाद, जब जिन्ना ने खान अब्दुल गफ्फार खान को ...
09/06/2026

भारत रत्न खान अब्दुल गफ्फार खान ( स्वतंत्रता सेनानी) का आखिरी सफर।

विभाजन के बाद, जब जिन्ना ने खान अब्दुल गफ्फार खान को चाय पर बुलाया, तो गले लगाते हुए कहा— "आज मैं महसूस कर रहा हूँ कि मेरा पाकिस्तान बनाने का सपना पूरा हुआ।"

पाकिस्तान की संसद में अपने पहले भाषण में उन्होंने बिना किसी डर के कहा— "मैंने उपमहाद्वीप के विभाजन का विरोध किया था।"* उन्होंने बंटवारे के खौफनाक मंजर पर दुख जताते हुए कहा कि अब लकीरें खिंच चुकी हैं, तो तकरार नहीं,*तामीर (निर्माण)** का वक्त है।

विडंबना देखिए, जिन 'बाचा खान' ने उम्र भर अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी, उन्हें आजादी के महज 10 महीनों के भीतर अपनी ही हुकूमत ने 'देशद्रोही' करार दे दिया।

1948 में उन्हें तीन साल के लिए जेल भेज दिया गया

1961 तक उन्हें 'अफगान एजेंट' कहकर प्रताड़ित किया गया, जिसके चलते उन्हें अपना वतन छोड़कर अफगानिस्तान में शरण लेनी पड़ी।

1987 में इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय जुड़ा जब भारत सरकार ने सीमाओं की दीवारें तोड़कर इस महान सेनानी को 'भारत रत्न' से नवाजा। यह महज एक मेडल नहीं था, बल्कि उस निस्वार्थ बलिदान को हिंदुस्तान का सलाम था।

1988 में जब उनका निधन हुआ, तो दुनिया ने एक ऐसा दृश्य देखा जो मिसाल बन गया। उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चल रहे युद्ध को एक दिन के लिए रोक दिया गया था। भारत में उनके सम्मान में 5 दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था।
वे अक्सर कहते थे कि उन्हें और उनके समर्थकों को 'भेड़ियों के आगे फेंक दिया गया है'। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विचारधारा और इंसानियत किसी पासपोर्ट की मोहताज नहीं होती।




07/06/2026

मेरे दुश्मन मैं जख्मी हूं मगर टूटा नहीं हूं
चलेगी सांस जब तक ये जंग जारी रहेगी,

यह किस्सा जीत पर या मौत पर ही खत्म होगा
की जिसका सर रहेगा उसकी ही सरदारी रहेगी ।


06/06/2026

''Dhoop Nikle Aur Barsaat Na Rahe,
Kal Ko Shayad Mere Bure Halaat Na Rahe,

Abhi Sasta Hu To Shayad Khareed Sakte Ho
Kal Ko Shayad Tumhari Aukaat Na Rahe''

07/05/2026

जब काकोरी कांड के बाद अशफ़ाकउल्ला खान और रामप्रसाद बिस्मिल को गिरफ्तार किया गया, तो जेलर ने अशफ़ाकउल्ला खाँ के कान में जहर घोलते हुए कहा— "अशफ़ाक, तुम क्यों एक हिंदू (बिस्मिल) के बहकावे में आकर अपनी जान दे रहे हो? वो तो अपने धर्म का राज चाहते हैं।"
अशफ़ाक का जवाब आज के हर भारतीय के लिए एक सबक है। उन्होंने मुस्कुराकर कहा— "रामप्रसाद बिस्मिल मेरे भाई हैं। वो जिस भारत का सपना देख रहे हैं, वो मेरा भी है। तुम मेरी गर्दन काट सकते हो, लेकिन हमारी रूहों को जुदा नहीं कर सकते।"

फांसी से कुछ दिन पहले जब बिस्मिल जेल में अपनी मां से मिले, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए। मां ने डांटा— मौत से डर गए क्या?
बिस्मिल बोले— "नहीं मां, डर मौत का नहीं है। मलाल इस बात का है कि मेरा भाई अशफ़ाक मुझसे दूर दूसरी जेल में है। काश! हम एक ही फंदे पर झूलते।"
क्या आप जानते हैं?
बिस्मिल और अशफ़ाक एक ही थाली में खाना खाते थे।बिस्मिल के घर में जब कोई उन्हें टोकता था कि मुसलमान के साथ क्यों खाते हो, तो बिस्मिल कहते थे— "अशफ़ाक का दिल गंगा की तरह पवित्र है।"

आज हम कहाँ खड़े हैं?
आज जब हम छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे से लड़ते हैं, तो शायद बिस्मिल और अशफ़ाक की रूहें रोती होंगी। उनकी शहादत किसी एक धर्म के लिए नहीं, बल्कि 'हम हिंदुस्तानियों' के लिए थी।
फांसी के फंदे को चूमते हुए अशफ़ाक ने कहा था— "मेरे हाथ नहीं कांप रहे, क्योंकि मैं अपने वतन के लिए कुर्बान हो रहा हूँ।" वहीं बिस्मिल ने गाया— "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।"
एक सवाल जो आप सभी से है...
क्या हम दोबारा वही 'साझा हिंदुस्तान' नहीं बना सकते जिसका सपना इन दो दोस्तों ने देखा था?
अगर आपको लगता है कि इनकी दोस्ती की मिसाल आज हर घर तक पहुँचनी चाहिए, तो
'बिस्मिल-अशफ़ाक के सम्मान में भावभीनी श्रद्धांजलि जरूर दें। इस पोस्ट को इतना शेयर करें ताकि नफरत फैलाने वालों को सही इतिहास पता चले।
कमेंट में शहीदों के सम्मान में एक ❤️ छोड़ें अगर आप इस दोस्ती का सम्मान करते हैं।

#रामप्रसादबिस्मिल

26/04/2026

#देशभक्त

जब मुगलों ने पूरे भारत को एक किया तो इस देश का नाम कोई इस्लामिक नहीं बल्कि 'हिन्दोस्तान' रखा, हालॉंकि इस्लामिक नाम भी रख सकते थे, कौन विरोध करता ?
जिनको इलाहाबाद और फैजाबाद चुभता है वह समझ लें कि मुगलों के ही दौर में 'रामपुर' बना रहा तो 'सीतापुर' भी बना रहा। अयोध्या तो बसी ही मुगलों के दौर में। 'राम चरित मानस' भी मुगलिया काल में ही लिखी गयी।
आज के वातावरण में मुगलों को सोचता हूँ, मुस्लिम शासकों के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने मुर्खता की। होशियार तो ग्वालियर का सिंधिया घराना था, मैसूर का वाडियार घराना भी था, जयपुर का राजशाही घराना भी था, तो जोधपुर का भी राजघराना था।
टीपू सुल्तान हों या बहादुरशाह ज़फर, बेवकूफी कर गये और कोई चिथड़े चिथड़ा हो गया तो किसी को देश की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई और सबके वंशज आज भीख माँग रहे हैं। अँग्रेजों से मिल जाते तो वह भी अपने महल बचा लेते और अपनी रियासतें बचा लेते, वाडियार, जोधपुर, सिंधिया और जयपुर राजघराने की तरह उनके भी वंशज आज ऐश करते। उनके भी बच्चे आज मंत्री विधायक बनते।
यह आज का दौर है, यहाँ 'भारत माता की जय' और 'वंदेमातरम' कहने से ही इंसान देशभक्त हो जाता है, चाहें उसका इतिहास देश से गद्दारी का ही क्यूं ना हो।
बहादुर शाह ज़फर ने जब 1857 के गदर में अँग्रेजों के खिलाफ़ पूरे देश का नेतृत्व किया और उनको पूरे देश के राजा रजवाड़ों तथा बादशाहों ने अपना नेता माना। भीषण लड़ाई के बाद अंग्रेजों की छल कपट नीति से बहादुरशाह ज़फर पराजित हुए और गिरफ्तार कर लिए गये।
ब्रिटिश कैद में जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि - "हिंदोस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं।"
बेवकूफ थे बहादुरशाह ज़फर। आज उनकी पुश्तें भीख माँग रहीं हैं।
अपने इस हिन्दोस्तान की ज़मीन में दफन होने की उनकी चाह भी पूरी ना हो सकी और कैद में ही वह "रंगून" और अब वर्मा की मिट्टी में दफन हो गये। अंग्रेजों ने उनकी कब्र की निशानी भी ना छोड़ी और मिट्टी बराबर करके फसल उगा दी, बाद में एक खुदाई में उनका वहीं से कंकाल मिला और फिर शिनाख्त के बाद उनकी कब्र बनाई गयी ! सोचिए कि आज "बहादुरशाह ज़फर" को कौन याद करता है ? क्या मिला उनको देश के लिए दी अपने खानदान की कुर्बानी से ?
ऐसा इतिहास और देश के लिए बलिदान किसी संघी का होता तो अब तक सैकड़ों शहरों और रेलवे स्टेशनों का नाम उनके नाम पर हो गया होता।
क्या इनके नाम पर हुआ ?
नहीं ना ? इसीलिए कहा कि अंग्रेजों से मिल जाना था, ऐसा करते तो ना कैद मिलती ना कैद में मौत, ना यह ग़म लिखते जो रंगून की ही कैद में लिखा :

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में।
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में।
कितना है बदनसीब 'ज़फर' दफ्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में॥

गंगनहर का निर्माण कब हुआ था?गंगनहर का निर्माण 1842 में शुरू हुआ और 1854 में पूरा हुआ था। इसकी खुदाई अप्रैल 1842 में शुरू...
21/04/2026

गंगनहर का निर्माण कब हुआ था?

गंगनहर का निर्माण 1842 में शुरू हुआ और 1854 में पूरा हुआ था। इसकी खुदाई अप्रैल 1842 में शुरू हुई और 8 अप्रैल 1854 को नहर को औपचारिक रूप से खोला गया था। इस नहर का मुख्य उद्देश्य भारत में गंग नदी और यमुना नदी के बीच दोआब क्षेत्र की सिंचाई करना था। नहर का निर्माण प्रोबी थॉमस काउटली की देखरेख में हुआ था, जिन्होंने इसके निर्माण में कई चुनौतियों का सामना किया था
इसकी फोटो तयार 4x6 मे

16/04/2026
16/04/2026

They say "knowing too much is a pain," but I say it's your superpower. 🌍💔 Your high EQ and sensitivity aren't weaknesses—they’re your conscience at work. In a world that often prefers blind faith, dare to keep your scientific temperament alive. Let’s build bridges, not walls. 🤝🔥













16/04/2026

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