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27/12/2016
26/12/2016

सारी बातें, CCTV कैमरे के बारे में जो जानना चाहेंगे आप

कभी अपनी यादों को सहेज कर रखने वाले कैमरा अब नए अवतार में आ चुका है। वह आपकी यादों को ही नहीं आपके हर पल पर नजर रखता है। सीसीटीवी कैमरे जहां सेफ्टी के टूल की तरह उभरे हैं तो हिडेन कैमरे करप्शन से लेकर शोषण के खिलाफ हथियार की तरह सामने आए हैं।

बड़े काम का कैमरा- एक जमाना था जब सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल दुकानों और ऑफिसों तक ही सीमित था। वक्त बदला और बढ़ती तकनीक और घटती कीमतों की वजह से सीसीटीवी कैमरे आम आदमी की पहुंच में आ गए। सीसीटीवी कैमरे न केवल सेफ्टी का एक सेंस देते हैं, बल्कि जहां आपकी आंख नहीं पहुंच सकती वहां तक आपको पहुंचाते हैं। पार्किंग में खड़ी गाड़ी से लेकर आपके घर में एंट्री करने वाले तक सब पर साथ-साथ नजर रखी जा सकती है। इतना ही नहीं, घर के बाहर होने पर मोबाइल के जरिए घर की लाइव फुटेज भी देख सकते हैं।

क्या है CCTV कैमरा CCTV का फुलफॉर्म क्लोज सर्किट टीवी कैमरे है। इसे समझने के लिए हमें यह समझना पड़ेगा कि क्यों इन्हें क्लोज सर्किट कैमरा कहा जाता है। किसी भी कैमरे से रेकॉर्ड हुई किसी भी चीज को देखने के लिए एक सर्किट के जरिए दर्शक तक पहुंचाया जाता है। केबल टीवी के प्रोग्रामों को देखने के लिए या तो केबल कंपनी कनेक्शन देती है या हम खुद ही डायरेक्ट टु होम सर्विस के जरिए प्रोग्राम को घर पर डिकोड कर लेते हैं।

इस तरह के कैमरा ट्रांस्मिशन को ओपन सर्किट कैमरा ट्रांस्मिशन कहते हैं, मतलब वह ट्रांस्मिशन जिसे कोई भी देख सकता है। इसके विपरीत जब कैमरे से रेकॉर्ड की कई किसी भी गतिविधि को सीमित लोग ही देख सकें तो उसे क्लोज सर्किट कैमरा ट्रांस्मिशन सकते हैं। ये कैमरे किसी खास जगह की गतिविधि को रेकॉर्ड करके सीमित लोगों तक उसे पहुंचाते हैं।

जगह और जरूरत के हिसाब से मार्केट में कई तरह के कई तरह के क्लोज सर्किट कैमरे मिलते हैं- आमतौर पर बॉक्स की तरह दिखने वाले कैमरे, जिसमे एक छोर पर लैंस के साथ आयताकार यूनिट होती है और दूसरी छोर पर विडियो रेकॉर्डर होता है। इनडोर इस्तेमाल के लिए बेहतर होते हैं।

बुलेट कैमरा:- यह कैमरा ट्यूब की तरह होता है। इसमें सिल्वर या एल्युमिनियम शेप के कवर में लेंस होते हैं जिससे रेकॉर्डिंग यूनिट जुड़ा रहता है। बाहर की हाई रेजॉल्युशन रेकॉर्डिंग के लिए बेहतर होते हैं।

डोम कैमरा:- इस तरह के कैमरे आसानी से छत पर लगाया जा सकता है। इससे कैमरा लगी जगह का लुक खराब नहीं होता और यह साफ नजर भी नहीं आते। घर या दुकान के भीतर कॉमन एरिया में इस्तेमाल करने के लिए बेहतर होते हैं।

पीटीजेड कैमरा:- पैन-टिल्ट-जूम स्टाइल के कैमरे सर्विलांस के वक्त दाएं, बाएं तो घुमाए ही जा सकते हैं, साथ ही इन्हें मनचाहे ऑब्जेक्ट पर जूम भी किया जा सकता है। बेहद संवेदनशील जगहों जैसे गोदाम या रक्षा प्रतिष्ठानों की निगरानी के लिए बेहतर होते हैं।

डे/नाइट कैमरा:- ये खास तरह के कैमरे दिन की अच्छी लाइट में तो कलर रेकॉर्डिंग करते हैं, लेकिन रात में ब्लैक एंड वाइट रेकॉर्डिंग करते हैं। इस तरह के कैमरों 'इंफ्रारेड कट फिल्टर' होते हैं जो कम रोशनी में भी हाई क्वॉलिटी ब्लैक ऐंड वाइट तस्वीर रेकॉर्ड करते हैं। आउटडोर और इंडोर में 24 घंटे निगरानी के लिए बेहतर होते हैं।

इंफ्रारेड कैमरा:- इस कैमरे के लेंस के चारों तरफ इंफ्रारेड एलईडी लगी होती है जो एक बीम की शक्ल में इंफ्रारेड लाइट छोड़ती है। इससे कम रोशनी में भी तस्वीरें रेकॉर्ड हो जाती हैं। सभी तरह के कैमरे मूलरूप से दो तरह की तकनीक पर काम करते हैं। रात में हाई डेफिनीशन रेकॉर्डिंग के लिए बेहतर होते हैं।

1- ऐनालॉग : इस तरह के कैमरे तस्वीर को ऐनालॉग फॉर्म में कैप्चर करते हैं। इन्हें डायरेक्ट विडियो टेप पर रेकॉर्ड किया जा सकता है। रेकॉर्डिंग स्पीड को इस तरह से सेट किया जाता है कि 3 घंटे का विडियो टेप 24 घंटे के मूवमेंट्स रेकॉर्ड कर सके। इस वजह से रेकॉर्डिंग का क्वॉलिटी अच्छी नहीं होती।

खासियत : - इसे लगवाने का खर्च कम होता है। - पुरानी तकनीक होने की वजह से इंस्टॉल करवाना ज्यादा आसान। - इसे कम महत्वपूर्ण जगहों मिसाल को तौर पर गोदाम आदि में इस्टॉल करवाना सस्ता और मुफीद साबित होता है।

कमी : - इसे अमूमन लाइव फीड के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता। - इसके जरिए रेकॉर्ड की गई फुटेज को घटना के बाद ही देखा जा सकता है। - इसे ऑपरेट करने के लिए (कैसेट बदलने) किसी अटेंडेंट की जरूरत बनी रहती है।

2. डिजिटल : इस तरह के कैमरे तस्वीर को डिजिटल फॉर्मेट में रेकॉर्ड करके सीधे कंप्यूटर में भेज सकते हैं। इसकी फुटेज को ऑनलाइन सर्वर पर स्टोर करने के साथ ही इंटरनेट के जरिए कहीं से भी लाइव (मोबाइल पर भी) देखा जा सकता है। इसी फुटेज के लोकल एरिया नेटवर्क के जरिए कहीं से भी आसानी से मॉनिटर किया जा सकता है।

खासियत : - इसके जरिए अच्छी इमेज क्वॉलिटी की तस्वीरें रेकॉर्ड की जा सकती हैं। - रेकॉर्डेड फुटेज को एक सॉफ्टवेयर के जरिए दुनिया भर में कहीं से भी देखा जा सकता है। - सेलेक्टेड लोकेशन का सेक्युरिटी एनालिसिस भी किया जा सकता है।

कमी : - इंस्टॉल करने का खर्च कुछ ज्यादा। - कई तरह के सॉफ्टवेयरों की जरूरत पड़ती है। - मॉनिटरिंग के लिए तकनीक की समझ वाले इंसान की जरूरत होती है।

IP कैमरा : कैमरे को मिला इंटरनेट साथ- इंटरनेट ने सर्विलांस कैमरों की दुनिया को पूरी तरह से बदल दिया है। इंटरनेट प्रोटोकॉल कैमरों का इस्तेमाल खासतौर पर निगरानी रखने के लिए किया जाता है। इसमें कैमरा रेकॉर्डेड फुटेज को इंटरनेट के सहारे कहीं भी भेज सकता है। इस तरह के कैमरों को आमतौर पर वेबकैम भी कहा जाता है।

खासियत : - इसके जरिए कैमरे में लगे स्पीकर और आईपीस के जरिए दोतरफा कम्युनिकेशन किया जा सकता है। मिसाल के तौर पर कहीं भी कैमरे पर देख कर कमांड सेंटर से गाइड किया जा सकता है। - नेटवर्क में बने रहते हुए कैमरों की जगह बदली जा सकती है। - इंटरनेट के सहारे दुनिया में कहीं से भी लाइव फुटेज देखी जा सकती है। - आईपी कैमरे वायरलेस नेटवर्क (वाई-फाई या किसी भी तरह का इंटरनेट कनेक्शन) के जरिए काम कर सकते हैं।

कमी : - लगवाने का खर्च ज्यादा - हाई रेजॉलूशन फुटेज देखने के लिए ज्यादा इंटरनेट बैंडविड्थ की जरूरत होती है। - इंटरनेट जैसे ओपन नेटवर्क से जुड़े होने की वजह से हैक होने का खतरा बना रहता है। - अलग-अलग डिवाइस और ऑपरेटिंग सिस्टम के हिसाब से कई तरह के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना पड़ता है।

पूरा होना चाहिए सिस्टम - अब अमूमन ऐसे डिजिटल कैमरे लगवाने का चलन है, जो हार्ड ड्राइव में फुटेज को इंस्टॉल करते हैं और मोबाइल पर कहीं से भी लाइव फीड दिखा सकते हैं। - सीसीटीवी सिस्टम के तीन हिस्से होते हैं।- 1 : कैमरे 2 : रेकॉर्डिंग यूनिट (DVR) 3 : मॉनिटर (अगर जरूरत है तो)

चैनल का चक्कर : घर में जितने कैमरे इंस्टॉल करवाने हैं, उन सभी की रेकॉर्डिंग को एक साथ मॉनिटर करने के लिए मल्टी चैनल सेटअप लगाना पड़ता है। मिसाल के तौर पर 4 चैनल, 8 चैनल, 16 चैनल आदि। यहां चैनल का मतलब है कि अधिकतम कितने कैमरों से रेकॉर्डिंग की जा सकती है। मिसाल के तौर पर अगर घर में 3-4 कैमरे लगे हैं तो 4 चैनल सेटअप की जरूरत होगी। कैमरे अगर 5 हैं तो 8 चैनल के सेटअप की जरूरत होगी। चैनलों का सेटअप 4 के मल्टिपल में ही आता है।

कैसे होगी प्लानिंग : - सबसे पहले यह सोचना होगा कि कैमरे की जरूरत किस लिए है। घर के अंदर की गतिविधियों पर नजर के लिए या ऑफिस या दुकान के भीतर-बाहर की निगरानी के लिए। - उसके बाद यह सोचना जरूरी है कि इस काम के लिए कितने कैमरों की जरूरत होगी। - जरूरत के हिसाब से कैमरों के स्पॉट को चुनना जरूरी है। इसके लिए आप कैमरा कंपनी और सिक्यॉरिटी एक्सपर्ट की सलाह भी ले सकते हैं। - अमूमन लोग अपनी गाड़ी के पार्क होने की जगह, घर का एंट्री पॉइंट और घर के कॉमन पैसेज जैसे टैरेस या लिविंग रूम हो सकता है। - जब इस सभी चीजों का फैसला हो जाता है, तब ही कैमरों की संख्या के बारे में सही फैसला लिया जा सकता है। - घरेलू इस्तेमाल के लिहाज से चार कैमरों का पैकेज सही रहता है।

करें फूल प्रूफ प्लानिंग : घर:- - अमूमन घरों में सीसीटीवी इंस्टॉल करवाते वक्त इन बातों का ध्यान रखा जाता है:-

- घर के एंट्रेंस और ब्लाइंड स्पॉट (पार्किंग, बैक डोर आदि) तो कवर करने की कोशिश की जाती है। - घर के बाहर पार्किंग या सीढ़ियों पर बुलेट कैमरा, घर के कॉमन स्पेस में डोम कैमरा और टेरेस पर बॉक्स कैमरे से नजर रखी जा सकती है। - विडियो रेकॉर्डर का स्टोरेज स्पेस 500 जीबी से 1 टीबी तक काफी है। अगर घर में तीन से चार कैमरे लगे हैं तो 1 टीबी की स्टोरेज में 15-20 दिन तक रेकॉर्डिंग स्टोर हो सकती है। इसके बाद की रेकॉर्डिंग ओवर लैप हो जाएगी। मतलब पुरानी रेकॉर्डिंग खुद ब खुद डिलीट होकर नई रेकॉर्डिंग अपडेट हो जाएगी। अगर किसी भी रेकॉर्डिंग को हमेशा के लिए रखना हो तो उसे डीवीआर से डाटा केबल के जरिए किसी दूसरी जगह ट्रांसफर किया जा सकता है। - इस तरह का सेटअप लगाने का खर्च अमूमन 22-24 हजार रुपए होता है।

ऑफिस/दुकान : - ऑफिस में अमूमन भीतर डोम कैमरे और एंट्रेंस पर बुलेट कैमरे का सेटअप लगता है। - दुकान में कैमरों का सेटअप जरूरत के हिसाब से लगाया जा सकता है। मिसाल के तौर पर अगर कीमती सामान की दुकान है, तो भीतर भी हाई रेजॉल्युशन बुलेट कैमरे लगवाए जा सकता हैं। इनसे दुकान के भीतर कस्टमर और स्टाफ की छोटी से छोटी हरकत पर नजर रखी जा सकती है। - मल्टी स्टोरी शॉप में हर स्टोरी पर 1-1 डोम, बॉक्स और बुलेट कैमरे का सेटअप लगवाया जा सकता है। - ऑफिस या दुकान में जरूरत को हिसाब से 20 हजार रुपए से 1 लाख रुपए तक का सेटअप लगवाया जा सकता है।

चलो स्पाई बन जाएं:- दिल्ली के सीएम ने करप्शन से लड़ाई लड़ने के लिए लोगों को छुपे हुए कैमरों के साथ मुस्तैद रहने की सलाह दी है। करप्शन की हर हरकत को रेकॉर्ड करने के बाद उन तक पहुंचाने की मुहिम से करप्शन खत्म होगा या नहीं इस पर लोगों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं लेकिन करप्ट लोगों के मन में कैमरे का डर जरूर पैदा करता है। जहां पहले प्रफेशनल जासूस या सिक्यॉरिटी एजेंसी के ट्रेंड लोग ही कैमरे को इस्तेमाल करते थे, अब आम आदमी भी इसकी ताकत को जानने लगा है। आइए चलते हैं स्पाई कैमरों की दुनिया में:

कैसे-कैसे कैमरे:- - स्पाई कैमरों की दुनिया इतनी गहरी है कि किस शक्ल में स्पाई कैमरे से आपका सामना हो जाएगा इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। - अमूमन स्पाई कैमरे पेन, कैप, बैग, टाई, बटन, मोबाइल, घड़ी और चाबी के गुच्छे की शक्ल में होते हैं। - हाई और लो ऐंड कैमरे मार्केट में मौजूद हैं। ज्यादातर सस्ते कैमरे रेकॉर्ड तो करते हैं लेकिन उनकी क्वॉलिटी इतनी अच्छी नहीं होती कि वह जरूरी तौर पर काम ही आ सके।

- जब भी स्पाई कैम खरीदें, क्वॉलिटी परख कर खरीदें। दुकानदार से डैमो फुटेज दिखाने के लिए भी कह सकते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि रेकॉर्डिंग की क्वॉलिटी कैसी होगी। - यह भी देख लें कि कैमरे की मेमरी कितनी है। अमूमन कैमरे 4 जीबी की मेमरी के साथ आते हैं, लेकिन जरूरत के हिसाब से ज्यादा मेमरी वाले कैमरे भी मार्केट में मिल सकते हैं। - स्पाई कैमरे की कीमत मार्केट में 250 रुपए से शुरू होकर 10,000 रुपए तक जा सकती है।

समझें इस्तेमाल : - किसी भी तरह के स्पाई कैमरे को इस्तेमाल करने से पहले अपनी जरूरत को समझें। मिसाल के तौर पर टारगेट को कितनी दूर से रेकॉर्ड करना है और किस गतिविधि को रेकॉर्ड करना है। - कैमरे के सेंसर और मेगापिक्सल जितने ज्यादा होंगे रिजल्ट उतने अच्छे होंगे। - ऑपरेट करने से पहले सारे फंक्शन आजमा कर देख लें। किस बटन से क्या होता है इसका पता होना बहुत जरूरी है।

- जिसकी हरकतें रेकॉर्ड करनी हैं, उससे किस एंगल से मुखातिब होंगे इसके बारे में भी सोचना जरूरी है। - प्रफेशनल स्पाई, रेकॉर्डिंग से पहले काफी प्रैक्टिस करते हैं और कीमती मौके को गंवाना नहीं चाहते। अच्छा होगा कि स्पाई कैमरे को आजमाने से पहले रिहर्सल कर लें। - इस बात को अच्छी तरह से समझ लें कि रेकॉर्ड की हुई फुटेज अगर सिस्टम की खामी उजागर करने के लिए है तब तो ठीक है, लेकिन किसी को धमकाने या परेशान करने के लिए की गई रेकॉर्डिंग जेल की हवा खिला सकती है।

कहीं जेल न हो जाए:- - कुछ परिस्थितियों में अपनी सेफ्टी और करप्शन के खिलाफ लड़ाई का हथियार आपकी मुसीबत भी बन सकता है। - अगर सीसीटीवी के जरिए किसी की अंतरंग तस्वीरें या प्राइवेट फुटेज रेकॉर्ड हो जाती हैं और उन्हें पब्लिक कर दिया जाता है तो इस परिस्थिति में आईटीएक्ट 2000 की सेक्शन 66ई के तहत केस बनता है। इसमें तीन साल की सजा और 2 लाख तक जुर्माने का प्रावधान है। - इसके अलावा करप्शन की लड़ाई के नाम पर अगर किसी को धमकाने की ऐक्टिविटी सामने आती है तो आईपीसी में भी केस बनता है।

26/12/2016

5 Major Advantages of Vehicle Tracking
With more cars on the roads now than ever before, vehicle tracking has become an incredibly important tool for employers who wish to evade such problematic and time-consuming traffic. But aside from avoiding traffic and road problems, here are 5 extra benefits advanced tracking units can supply to businesses:

Save Money on Fuel
Like standard GPS models, vehicle tracking software will calculate the quickest and most economical route to the required destination. Some of the more advanced tracking kits give employers an update in real-time as to how much fuel is being consumed, making it easier to forecast fuel costs and allowances.

Less Potential Collisions
Research suggests that when people know they are being watched or simply get the feeling they are being watched, they become more self-conscious and more cautious. This translates, in the driving seat, to a more self-aware driver who is far less likely to have a collision that could costs the company money in repair costs or even vehicle replacement costs in the event of a write-off. A GPS tracking unit, by simply making the employee feel watched, improves their awareness and decreases their risk behind the wheel.

Managers in the Driving Seat
This type of tracking puts the employers and managers back into the driving seat by giving them more eyes on outgoing business, more knowledge and more control. It gives them an up to date view of all business geographically in real-time and, as such, lets them assume control of every single vehicle simultaneously.

Greater Foresight
Through the vehicle tracking unit, drivers, employers and managers can be notified well in advance of any upcoming traffic problems, diversions or closures, allowing them to react more quickly to avoid such an obstacle and limit the detrimental effect such an eventuality may have otherwise had on the business of the day.

Improves Employee Driving Habits
To prevent long-term damage to the car that accumulates and worsens over time, an advanced tracking unit can be used to monitor the habits of the driver, spotting any potentially bad driving habits that could be bad for that vehicle’s health. The system looks out for bad habits such as breaking too hard or running fuel dangerously low that, over a long period of time, could cause serious damage to the car that would ultimately cost the company with no one to blame. Through this technology, employers can warn employees about their bad driving habits and make an effort to stop those habits that may bring about damage to the car in the near future.

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16/12/2016
https://youtu.be/hcDGf2xLYLg
16/12/2016

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Demand for futuristic features has been increasing among luxury homeowners. The Erwins purchased a home adaptable to future technology; a San Francisco spec ...

16/12/2016

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