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you updated about recent happenings,best landscape, historical and mythological places in your city Lohardaga. मनु संहिता में उल्लिखित मुख्य पृष्ठ की पंक्तियाँ नव सृजित झारखण्ड राज्य के अंतर्गत सात प्रखण्डों का अनुपम लोहरदगा जिला अपने प्राकृतिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहरों के मूल भाव को अक्षरश: चरितार्थ करते हुए पर्यटन की दृष्ट
ि से विशिष्ट स्थान रखता है | ऋग्वेद काल में कीकट क्षेत्र की अन्मुक्ति से लेकर मगध, ब्रात्य प्रदेश, पुण्ड्र,पौण्ड्र, पौण्ड्रिक, अर्कखंड साथ की सम्पूर्ण झलक लोहरदगा जिला की प्राकृतिक मनोहर वादियों में देखी जा सकती है |
एक ओर जहाँ शंख और कोयल नदियाँ कलकल करती अपनी मधुर आवाज से मन – मस्तिष्क को तनाव मुक्त करती है, तो दूसरी ओर यहाँ के सदाबहार वन योग निद्रा के विश्राम केंद्र हैं | प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ पुरातात्विक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों का खजाना भी यहाँ है | खकपरता, कोराम्बे, कसपुर, अखिलेश्वर धाम जैसे पुरातात्विक महत्व के क्षेत्र समय यात्रा की सांस्कृतिक वर्णमाला है |
नदियों, नालों, पहाड़ों एवं जंगलों से आच्छादित हरीतिमा लिए अपने गर्व में अनेक महत्वपूर्ण खनिज रत्नों को समेटे लोहरदगा का वर्णन प्रागैतिहासिक दस्तावेजों में भी उपलब्ध है | मुण्डारी भाषा में लोहरदगा का नामकरण “लोर-अ-दगा” के रूप में किया गया है जिसका शाब्दिक अर्थ है “नदी से किनारे का गांव” | नदी के किनारे के इस गांव (लोहरदगा) का उल्लेख जैन साहित्यों में भी बिहार के उन स्थानों के साथ मिलता है जहाँ भगवान महावीर ने पदार्पण किया था, तब इसका नाम “लोहंग्ग्ज” के रूप में मिलता है | मध्यकालीन भारत के साहित्य “आइने अकबरी” में इसे “किस्मते-लोहरदगा” के नाम से नवाजा गया है | जिले के कोराम्बे, भंडरा, खुखरा, भक्सो एवं कुम्हरिया आदि स्थलों में प्राप्त पुरातात्विक महत्व के अवशेषों एवं भवनों से इस भाग के ऐतिहासिक उतर-चढ़ाव के साक्ष्य मिलते हैं |
वर्ष 1833 में जब राँची, पलामू, धालभूम को मिलाकर दक्षिणी पश्चिमी फ्रंटियर एजेंसी का निर्माण हुआ, तो लोहरदगा को ही तत्कालीन गवर्नर के प्रिंसिपल एजेंट का मुख्यालय बनाया गया था, इससे इस स्थान के सामरिक महत्व का भी पता चलता है, सन 1854 में साऊथ वेस्ट फ्रोंटिवर एजेंसी के समाप्त कर दिए जाने के बाद लोहरदगा को छोटानागपुर कमिश्नरी का मुख्यालय बनने का गौरव प्राप्त हुआ |
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी लोहरदगा जिला के वीर सपूतों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है | यह जिला पाण्डेय गनपत राय, वीर बुद्दू भगत एवं लालू टाना भगत जैसे अमर शहीदों की जन्म स्थली एवं कर्म भूमि रही है | उनकी जन्म स्थली आज भी लोहरदगा जिला की शान बढ़ा रहा है |
अविभाजित बिहार राज्य के अंतर्गत 17 मई 1983 को लोहरदगा जिला अपने अस्तित्व में आया, तब से लेकर आज तक यह जिला प्रगति की ओर अग्रसर है | यह जिला न सिर्फ रत्नगर्भ है बल्कि अपने पौराणिक ,ऐतिहासिक ,सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है | पर्यटन की दृष्टि से ज़िले के आकर्षक एवं मनमोहक स्थलों की विशेषताएं एवं उनकी यात्रा विवरणी अग्रांकित है | यात्रा का मार्ग राजधानी राँची से जिला मुख्यालय 75 कि० मी० की दुरी पर अवस्थित है | राजधानी से जिला मुख्यालय आने के दो साधन है :
1.सड़क मार्ग 2. रेल मार्ग
राजधानी से अनेक बसें लोहरदगा के लिए चलती है जिसके माध्यम से आपकी मंगलमय यात्रा लोहरदगा तक होगी | वर्तमान समय में राँची से लोहरदगा तक के लिए रेलवे आवागमन की सुविधा उपलब्ध है | रेल के माध्यम से सुविधाजनक स्थिति में लोहरदगा आया जा सकता है |
पलामू की ओर से कई बसें लोहरदगा तक आतीं हैं | पलामू से राँची जाने वाली बसों से भी कुडू उतरकर सीधे लोहरदगा आया जा सकता है |
गुमला से अनेक बसें लोहरदगा आतीं हैं जिसके माध्यम से आप लोहरदगा आ सकते हैं | यदि आपकी निजी गाड़ी उपलब्ध है तो यात्रा ओर भी सुविधाजनक होगी |