Vedas

Vedas Vedic literature

21/11/2022

Brihadeeswara Temple in Tamil Nadu
9 reasons why the Brihadeeswara Temple in Tamil Nadu, is one of the greatest structures ever built.

1. The Mandir is built using the interlock method where no cement, plaster or adhesive was used between the stones. It has survived 1000 years and 6 earthquakes.

2. The Mandir tower at 216 feet was likely the tallest in the world at the time.

3. The other structures built using this method Big Ben and Leaning Tower of Pisa are tilting with time. The Mandir which is far older has zero degree inclination.

4. 130,000 tons of granite was used to build the Mandir which was transported by 3000 elephants from 60 kms away

5. The Mandir was constructed without digging the earth. There was no foundation dug for the Mandir!

6. The Kumbham at the top of the Mandir tower weighs 80 tons and is monolithic. Yes monolithic! Craved from a single stone

7. Several theories exist as to how the 80 ton stone piece got atop the 200+ feet tower. Some suggest the use of levitation technology, but the more plausible explaination seems to be the use of elephants to pull the stone piece across a nearly 6 km long ramp.

8. It is said that several underground passages exist below the Mandir, most of whichwere sealed off centuries ago. It is said that these underground passages were safety traps and exit points for the Cholas. Some souces put the count of these passages to 100

9. The Mandir is so remarkable that some people go the the extent of saying that it was built by aliens. There is nothing quite like the Brihadeeswara Mandir and there will never be something quite like it. Raja Raja Chola was a visionary. We must treasure this timeless marvel.

28/10/2022

षोडश संस्कार

संस्कारों हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्योषाप नयनेन वा ॥
-ब्रह्मसूत्र भाष्य 1/1/4

अर्थात व्यक्ति में गुणों का आरोपण करने के लिए जो कर्म किया जाता है, उसे संस्कार कहते हैं।

संस्कार कितने?

गौतम स्मृति शास्त्र में 40 संस्कारों का उल्लेख है। कुछ जगह 48 संस्कार भी बताए गए हैं। महर्षि अंगिरा ने 25 संस्कारों का उल्लेख किया है। वर्तमान में महर्षि वेदव्यास स्मृति शास्त्र के अनुसार, 16 संस्कार प्रचलित हैं, उसके अनुसार-

गर्भाधानं पुंसवनं सीमंतो जातकर्म च। नामक्रियानिष्क्रमणेअन्नाशनं वपनक्रिया:।।
कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारंभक्रियाविधि:। केशांत स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रह:।।

त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्कारा: षोडश स्मृता:। (व्यासस्मृति 1/13-15)

संस्कारों से हमारा जीवन बहुत प्रभावित होता है। संस्कार के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों में जो पूजा, यज्ञ, मंत्रोच्चारण आदि होता है, उसका वैज्ञानिक महत्व भी होता है।

सनातन धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र एवं मर्यादित बनाने के लिये संस्कारों का अविष्कार किया। धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। भारतीय संस्कृति की महानता में इन संस्कारों का महती योगदान है।

हमारे धर्मशास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है। इनमें पहला गर्भाधान संस्कार और मृत्यु के उपरांत अंत्येष्टि अंतिम संस्कार है। गर्भाधान के बाद पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण ये सभी संस्कार नवजात का दैवी जगत् से संबंध स्थापना के लिये किये जाते हैं।
नामकरण के बाद चूडाकर्म और यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इसके बाद विवाह संस्कार होता है। यह गृहस्थ जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। हिन्दू धर्म में स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सबसे बडा संस्कार है, जो जन्म-जन्मान्तर का होता है।

विभिन्न धर्मग्रंथों में संस्कारों के क्रम में थोडा-बहुत अन्तर है, लेकिन प्रचलित संस्कारों के क्रम में गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, विद्यारंभ, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह तथा अन्त्येष्टि ही मान्य है।

गर्भाधान से विद्यारंभ तक के संस्कारों को गर्भ संस्कार भी कहते हैं। इनमें पहले तीन (गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन) को अन्तर्गर्भ संस्कार तथा इसके बाद के छह संस्कारों को बहिर्गर्भ संस्कार कहते हैं। गर्भ संस्कार को दोष मार्जन अथवा शोधक संस्कार भी कहा जाता है। दोष मार्जन संस्कार का तात्पर्य यह है कि शिशु के पूर्व जन्मों से आये धर्म एवं कर्म से सम्बन्धित दोषों तथा गर्भ में आई विकृतियों के मार्जन के लिये संस्कार किये जाते हैं। बाद वाले छह संस्कारों को गुणाधान संस्कार कहा जाता है। दोष मार्जन के बाद मनुष्य के सुप्त गुणों की अभिवृद्धि के लिये ये संस्कार किये जाते हैं।

हमारे मनीषियों ने हमें सुसंस्कृत तथा सामाजिक बनाने के लिये अपने अथक प्रयासों और शोधों के बल पर ये संस्कार स्थापित किये हैं। इन्हीं संस्कारों के कारण भारतीय संस्कृति अद्वितीय है। हालांकि हाल के कुछ वर्षो में आपाधापी की जिंदगी और अतिव्यस्तता के कारण सनातन धर्मावलम्बी अब इन मूल्यों को भुलाने लगे हैं और इसके परिणाम भी चारित्रिक गिरावट, संवेदनहीनता, असामाजिकता और गुरुजनों की अवज्ञा या अनुशासनहीनता के रूप में हमारे सामने आने लगे हैं।

गर्भाधान
पुंसवन
सीमन्तोन्नयन
जातकर्म
नामकरण
निष्क्रमण
अन्नप्राशन
चूड़ाकर्म
विद्यारम्भ
कर्णवेध
यज्ञोपवीत
वेदारम्भ
केशान्त
समावर्तन
विवाह
अन्त्येष्टि

गर्भाधान**********
हमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। गार्हस्थ्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए। वैदिक काल में यह संस्कार अति महत्वपूर्ण समझा जाता था।

पुंसवन*******
गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। हमारे मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है ।
सीमन्तोन्नयन
सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।

जातकर्म******
नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है तथा नौ मन्त्रों का विशेष रूप से उच्चारण के बाद बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।

नामकरण********

आयुर्वर्चोअभिवृद्धिश्च सिद्धिव्र्यवह्रतेस्तथा। नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभि:।। (स्मृतिसंग्रह)

जन्म के ग्यारहवें दिन यह संस्कार होता है। हमारे धर्माचार्यो ने जन्म के दस दिन तक अशौच (सूतक) माना है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।

नामकरण संस्कार का सनातन धर्म में अधिक महत्व है। हमारे मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। तभी तो यह कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम हमारे धर्म विज्ञानियों ने बहुत शोध कर नामकरण संस्कार का आविष्कार किया। ज्योतिष विज्ञान तो नाम के आधार पर ही भविष्य की रूपरेखा तैयार करता है।

निष्क्रमण*********

निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युद्दिष्टा मनीषिभि:।

दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्दे निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।

अन्नप्राशन*********

माता के गर्भ में रहते हुए शिशु के पेट में गंदगी चली जाती है, जिससे उस शिशु में दोष आ जाते हैं। अन्नप्राशन संस्कार के माध्यम से उन दोषों का नाश हो जाता है- अन्नाशमान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुध्दयति।

इस संस्कार का उद्देश्य शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास पर ध्यान केन्द्रित करना है। अन्नप्राशन का स्पष्ट अर्थ है कि शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। इसलिये इस संस्कार का हमारे जीवन में विशेष महत्व है।

हमारे धर्माचार्यो ने अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। अमृत: क्षीरभोजनम् हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान उत्तम माना गया है।

शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमधौ।
एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुंचतो अंहस:।। (अथर्ववेद 8/2/18)

चूड़ाकर्म*********
चूड़ाकर्म को मुंडन संस्कार भी कहा जाता है। हमारे आचार्यो ने बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान बताया है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की परिकल्पना हमारे मनीषियों के मन में होगी। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण कई दूषित किटाणु उसके बालों में रहते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का सफाया होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ यह संस्कार सम्पन्न होता है।

विद्यारम्भ*********
विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में हमारे आचार्यो में मतभिन्नता है। कुछ आचार्यो का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं। मेरी राय में अन्नप्राशन के समय शिशु बोलना भी शुरू नहीं कर पाता है और चूड़ाकर्म तक बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति जगने लगती है। इसलिये चूड़ाकर्म के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। माँ-बाप तथा गुरुजन पहले उसे मौखिक रूप से श्लोक, पौराणिक कथायें आदि का अभ्यास करा दिया करते थे ताकि गुरुकुल में कठिनाई न हो। हमारा शास्त्र विद्यानुरागी है। शास्त्र की उक्ति है सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिला सके। विद्या अथवा ज्ञान ही मनुष्य की आत्मिक उन्नति का साधन है। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये।

कर्णवेध*******
हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है। कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है। बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।

यज्ञोपवीत*******
यज्ञोपवीत अथवा उपनयन बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। हमारे मनीषियों ने इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्र है।

"यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं " अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। इस संस्कार के बारे में हमारे धर्मशास्त्रों में विशेष उल्लेख है। यज्ञोपवीत धारण का वैज्ञानिक महत्व भी है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक विशेष अध्ययन के लिये गुरुकुल जाता था। यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

वेदारम्भ******
ज्ञानार्जन से सम्बन्धित है यह संस्कार। वेद का अर्थ होता है ज्ञान और वेदारम्भ के माध्यम से बालक अब ज्ञान को अपने अन्दर समाविष्ट करना शुरू करे यही अभिप्राय है इस संस्कार का। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। स्पष्ट है कि प्राचीन काल में यह संस्कार मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखता था। यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये योग्य आचार्यो के पास गुरुकुलों में भेजा जाता था। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। हमारे चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं।

केशान्त******
गुरुकुल में वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था।

समावर्तन*********
गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

विवाह***********

ब्राह्माद्युद्वाहसंभूत: पितृणां तारक: सूत:।
विवाहस्य फलं त्वेतद् व्याख्यातं परमर्षिभि:।। (स्मृतिसंग्रह)

प्राचीन काल से ही स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का हमारे शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।

हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। समय के अनुसार इनका स्वरूप बदलता गया। वैदिक काल से पूर्व जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था। हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना करके समाज को संगठित एवं नियमबद्ध करने का प्रयास किया। आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है।

अन्त्येष्टि**********
अन्त्येष्टि को अंतिम अथवा अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है। आत्मा में अग्नि का आधान करना ही अग्नि परिग्रह है। धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मृत शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं। हमारे शास्त्रों में बहुत ही सहज ढंग से इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है। जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है। प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है। उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष या निर्वाण है। मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। इसी परिकल्पना के तहत मृत देह की विधिवत क्रिया होती है।

.                🚩 श्री रामेश्वरम् धाम 🚩 🚩 रामेश्वरम् के नाम से भारतवर्ष में कोई ऐसा हिन्दू न होगा, जो परिचित न हो। हमार...
05/10/2022

. 🚩 श्री रामेश्वरम् धाम 🚩

🚩 रामेश्वरम् के नाम से भारतवर्ष में कोई ऐसा हिन्दू न होगा, जो परिचित न हो। हमारे देश भारत में प्राचीन काल से चारों दिशाओं में चार धाम प्रतिष्ठित हैं–

१–उत्तरके हिमाचल पर्वतमाला में बदरी विशाल

२–पूर्व में भगवान् जगन्नाथ

३–पश्चिम में द्वारकाधीश

४–दक्षिण में रामेश्वरम्;

🚩 जिनमें पहले तीन धाम भगवान् विष्णु के अवतारों से सम्बद्ध हैं तथा रामेश्वरम् भगवान् राम से पूजित भगवान् शिव का धाम है। इसीलिये इसका नाम रामेश्वरम् पड़ा है।

🚩 सेतु-बन्धन के समय श्रीरामजी को वह स्थान बहुत ही रमणीय और उत्तम लगा, उन्होंने वानरराज सुग्रीव से कहा कि इस स्थान की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। मैं यहाँ शिवजी की स्थापना करूँगा। मेरे हृदय में यह महान् संकल्प है–

परम रम्य उत्तम यह धरनी।
महिमा अमित जाइ नहिं बरनी॥
करिहउँ इहाँ संभु थापना।
मोरे हृदयँ परम कलपना॥

🚩 गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लंकाकाण्ड के दूसरे दोहे के अन्तर्गत रामेश्वरम् धाम की महिमा का बखान किया है। भगवान् श्रीराम कहते हैं–

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं।
ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं॥
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि।
सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि॥
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि।
भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही।
सो बिनु श्रम भवसागर तरिही॥

रामेश्वरम् में दर्शन का क्रम

🚩 स्फटिक लिंग–रामेश्वरम्‌ में स्फटिक लिंग के दर्शनों का अपना अलग महत्त्व है। इसके दर्शन प्रातः साढ़े चार बजे से पाँच बजे के बीच में ही होते हैं। मन्दिर खुलते ही प्रथम इसकी पूजा होती है। इस पर दूध की धारा चढ़ाते हैं, जो प्रसाद के रूप में दर्शन करने वालों को दिया जाता है। इसके बाद समुद्र में स्नान किया जाता है । समुद्र-स्नान के पश्चात् बाईस कुण्डों (तीर्थों) में स्नान किया जाता है। रामेश्वरम्‌ में सभी का शुल्क लगता है।

🚩 जैसे ही आप स्नान करके बाहर से पूजा-सामग्री नारियल, फूल-माला तथा हरिद्वार, गंगोत्री आदि से लाया हुआ गंगाजल लेकर अन्दर जायँगे तो टिकट लेना पड़ता है। यहाँ जल मन्दिर के पुजारी द्वारा ही चढ़ाया जाता है। आपसे जल एवं प्रसाद लेकर आपके सामने ही भगवान्‌ का अभिषेक किया जाता है।

🚩 रामेश्वरम् भगवान् के दर्शनों से पहले दायीं ओर विश्वनाथ लिंग के दर्शनों का प्रावधान है, क्योंकि रामचन्द्रजी के वचनों के अनुसार पहले हनुमान्जी द्वारा कैलास पर्वत से लाये गये लिंग (हनुमदीश्वर) का दर्शन किया जाता है।

🚩 बायीं ओर दूसरे घेरे में जाने पर पार्वतीदेवी का मन्दिर है। वहीं पर शयन-कक्ष है। जहाँ भगवान् की सोने की मूर्ति को शयन-कक्ष में लाया जाता है और शयन-पूजा होती है तथा सभी को प्रसाद दिया जाता है। इसी प्रकार प्रातः भगवान्‌ की मंगला आरती होती है। इन दोनों का दर्शन जरूर करना चाहिये।

रामेश्वरम् में हनुमान्जी के विग्रह

🚩 मन्दिर के पूर्वी द्वार के दायीं ओर हनुमान्जी का अद्भुत मन्दिर है, जिसका आधा हिस्सा पाताल में जल के अन्दर है। तथा आधा हिस्सा (धड़) ऊपर है, जिसके दर्शन होते हैं। यहाँ हनुमान्जी के उग्र रूप के दर्शन होते हैं। यहाँ पर हनुमान्जी द्वारा कैलास से लाया गया दूसरा शिवलिंग भी है।

🚩 साक्षी हनुमान्–रामझरोखा (गन्धमादन) जाने के रास्ते में मद् हनुमान्‌ का मन्दिर है, यहाँ हनुमान्जी के बालरूप के दर्शन होते हैं। रामझरोखे में भगवान् के चरणचिह्नों के दर्शन होते हैं।

🚩 पंचमुखी हनुमान्–पंचमुखी हनुमान्‌ के मन्दिर में ही तैरने वाले पत्थरों के दर्शन होते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये वही पत्थर हैं, जो भगवान् श्रीरामद्वारा लंका पर चढ़ाई के समय राम-नाम लिखकर नल-नील द्वारा समुद्र पर सेतुनिर्माण में प्रयुक्त हुए थे। यहाँ पर अभी १८ फुट ऊँचा हनुमान्-विग्रह का नवनिर्माण कराया गया है।

श्रीहनुमान् कुण्डतीर्थ–यह मन्दिर उत्तर पूर्व दिशा में स्थित है।

रामेश्वरम्‌ में अन्य मन्दिर

🚩 एकान्तनाथ मन्दिर–वैसे तो रामेश्वरम् की भूमि का कण-कण मन्दिर है, जिनमें मुख्य एकान्तनाथ रामेश्वर मन्दिर है, यहाँ पर भगवान् राम भाई लक्ष्मण से युद्ध की भूमिका पर चर्चा कर रहे हैं।

🚩 कोदण्ड रामजी का मन्दिर–यहाँ पर लंकापति रावण के भाई विभीषण ने राम की शरण ली थी तथा भगवान् राम ने समुद्र के जल से तिलक करके उन्हें लंका का राजा घोषित कर दिया था।

🚩 धनुष्कोटि–रामेश्वरम् के साथ-साथ धनुष्कोटि का भी बहुत महत्त्व है, यहाँ पर दो समुद्रों का संगम है बंगाल की खाड़ी और महोदधि। सन् १९६४ई० में समुद्री तूफान में रामेश्वरम् से इसका सम्पर्क टूट गया था और वहाँ के मन्दिर भी टूट गये थे। वहाँ अभी मछुवारों की बस्ती है, और कुछ नहीं है।

🚩 रामेश्वरम् के दर्शन पूर्ण करने पर ६० कि०मी०पर रामनाद (रामनाथपुरम्) शहर है। शहर से लगभग १० कि०मी० पर त्रिप्लीनी नाम की जगह है। वहाँ पर भगवान् राम दर्भ-शयन करके समुद्र से लंका जाने के लिये मार्ग देने की प्रार्थना करते लेटे थे।

🚩 जब समुद्र नहीं माना तो भगवान् ने अपना विराट् रूप समुद्र को दिखाया और यह बताया कि मैं ही रामरूप में विष्णु का अवतार हूँ, वहीं विष्णुरूप के शेषशय्या पर भगवान् दर्शन दे रहे हैं। इसी मन्दिर में कोदण्डराम, आदि-जगन्नाथ, साक्षी गोपाल, पद्मावती देवी, महालक्ष्मी आदि के मन्दिर हैं। कहते हैं यहीं पर महाराजा दशरथ ने पुत्रप्राप्ति के लिये तपस्या की थी।

🚩 यहाँ से ५ कि०मी०पर हनुमान्जी का मन्दिर है, वहीं लंका जलाने के पश्चात् हनुमान्जी कूदकर इस पार आये थे। इस स्थान को सेतुकर कहते हैं।

🚩 देवीपत्तनम्–रामनाद से देवीपत्तनम् लगभग २० कि०मी० दूर है। यहाँ भगवान् राम ने नवग्रहों का पूजन किया था। यहाँ समुद्र में नवग्रहों के पाषाण खड़े हैं। यहीं पर दुर्गादेवी ने महिषासुर का वध किया था, इसीलिये यह स्थान देवीपत्तनम् नाम से प्रसिद्ध हो गया।

🚩 रामेश्वरम् मन्दिर–यह मन्दिर समुद्र के किनारे लगभग बीस बीघे के विस्तार में है। मन्दिर के चारों ओर ऊँचा परकोटा है। इसमें पूर्व तथा पश्चिम में ऊँचे गोपुर हैं। पूर्वद्वार का गोपुर दस मंजिल का और पश्चिम द्वार का गोपुर सात मंजिल का है।

🚩 पश्चिम द्वार से भीतर जाने पर तीन ओर मार्ग जाता है–सामने, दायें और बायें। मन्दिर के पश्चिम द्वार से प्रवेश करके जो मार्ग बायीं ओर गया है, उससे प्रदक्षिणा करते हुए आगे जाना चाहिये। इन मार्गों के दोनों ओर ऊँचे बरामदे हैं और ऊपर छत है। मार्ग में दोनों ओर स्तम्भों में सिंहादि की सुन्दर मूर्तियाँ बनी हैं। श्रीरामेश्वर मन्दिर के सम्मुख स्वर्णमण्डित स्तम्भ है, उसके पास ही नन्दी की श्वेतवर्ण की विशाल मृण्मयी मूर्ति है।
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