01/11/2016
अगर बाबा साहेब न होते तो शायद मुसलमानों के तीन तलाक के मुददे की तरह हिन्दू महिलाओं के तलाक के लिए भी बहस चल रही होती और जो मुस्लिम संस्थाओं को कोस रहे हैं वो देश व्यापी विद्रोह की बात कर रहे होते। वो हिन्दू ठेकेदार भी मुसलमानों की तरह ही इसे धर्म शास्त्रों के विरुद्ध कह रहे होते।
अब यह मत कहना कि ऐसा कुछ नही होता क्योंकि ऐसा ही हो चूका है, बाबा साहेब के हिन्दू कोड बिल और बनारस के कृपात्री महाराज का इंडिया गेट में प्रदर्शन तथा नेहरू का हिन्दू कोड बिल वापस लेना, इतिहास में अंकित है। बाबा साहेब की मृत्यु के बाद ही सही लेकिन उनके बिल टुकड़ों टुकड़ों में पास जरूर हो गए। मुस्लिम संगठन व् उनके ठेकेदारों को अभी दोहरा डर है। एक कही महिलाएं पुरुषों से आगे न निकल जायें क्योंकि भारत में धर्म कोई भी हो सोच पुरुष प्रधान है, दूसरी बात इसे मोदी सरकार से जोड़कर देख रही है कि कही इसका क्रेडिट भाजपा वाले न ले जाएं।
भाजपा वाले तो सर्जिकल स्ट्राइक का क्रेडिट लेने के लिए भी यूपी में बड़े बड़े होर्डिंग लगा चुकी है तो तीन तलाक का मुद्दा तो शत प्रतिशत बनायेगी मगर यहाँ बात औरत के सम्मान की है तो तीन तलाक को खत्म करना शरीयत या इस्लाम के खिलाफ नही और मोदी या भाजपा या अन्य के समर्थन में नही यह एक स्वतंत्रता का मामला है जिसे बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था।
हालाँकि सामान नागरिक संहिता आजकल मुद्दा बनी हुई है, लेकिन केवल मुसलमानों के लिए या मुसलमानों की वजह से यह संहिता लागू नही हो पा रही बल्कि हिन्दू धार्मिक ठेकेदार भी इसको लागू नही करेंगे क्योंकि उनको अपनी जातियाँ और दुकानदारी की भी फ़िक्र है। हां यह भी सत्य है कि इसका ठीकरा फिलहाल मुस्लिमों पर फोड़ा जा रहा है।