23/02/2026
बिहार में फ्लाई ऐश ईंट उद्योग — विस्तृत विवरण (हिंदी में)
प्रस्तुतकर्ता: विकाश कुमार सिंह, महासचिव, बिहार फ्लाई ऐश ब्रिक इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (B-FABIA)
परिचय
बिहार में ईंट उद्योग कृषि के बाद ग्रामीण क्षेत्र का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है। 2016 के आंकड़ों के अनुसार बिहार में 7,865 पारंपरिक मिट्टी की ईंट भट्टियाँ थीं, जो राज्य में CO₂ उत्सर्जन के दूसरे सबसे बड़े स्रोत हैं। ये भट्टियाँ प्रति वर्ष लगभग 20 करोड़ टन उपजाऊ मिट्टी का दोहन करती हैं।
बिहार में वर्तमान में 7 ताप विद्युत संयंत्र (TPP) हैं जिनकी क्षमता 7050 MW है और 6630 MW की अतिरिक्त विस्तार योजना भी है, जिससे फ्लाई ऐश की उपलब्धता और बढ़ेगी।
वर्तमान में बिहार में लगभग 1200 से 1500 फ्लाई ऐश ईंट इकाइयाँ स्थापित हैं, जो प्रति वर्ष 400 करोड़ ईंटें बना सकती हैं। लेकिन यह बिहार की कुल 2000 करोड़ ईंटों की वार्षिक आवश्यकता का मात्र 20% ही है।
चिंताजनक स्थिति
1500 इकाइयों में से 800 से अधिक इकाइयाँ इस समय बंद पड़ी हैं। इसके मुख्य कारण हैं — ताप विद्युत संयंत्रों से सूखी फ्लाई ऐश की अनियमित आपूर्ति और सरकारी निर्माण कार्यों में 100% फ्लाई ऐश ईंट उपयोग के नियम का पालन न होना। फिर भी हर साल 200 से अधिक नई इकाइयाँ खुल रही हैं।
बिहार पर क्यों ध्यान दें?
बिहार भारत का सबसे घनी आबादी वाला राज्य है — 1488 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह 12वें स्थान पर है। राज्य की 75% से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है और धान, गेहूँ व मक्का जैसी फसलों के लिए उपजाऊ भूमि अत्यंत आवश्यक है। ऐसे में फ्लाई ऐश को ऐश डाइक में फेंकने से कीमती जमीन और भूजल दोनों बर्बाद होते हैं।
नीति एवं कानूनी ढाँचा
MoEF&CC ने 1999 से 2021 तक फ्लाई ऐश उपयोग संबंधी गजट अधिसूचनाएं जारी की हैं। 30 जनवरी 2026 को ऊर्जा मंत्रालय की नई एडवाइजरी जारी हुई है। राज्य सरकार ने सरकारी निर्माण में फ्लाई ऐश ईंट का अनिवार्य उपयोग तय किया है और नई पारंपरिक भट्टियों के लाइसेंस पर रोक लगाई गई है।
पर्यावरणीय एवं आर्थिक लाभ
फ्लाई ऐश ईंट उद्योग उपजाऊ मिट्टी की खुदाई रोकता है, ताप विद्युत संयंत्रों के कचरे को संपदा में बदलता है और कार्बन उत्सर्जन शून्य है। यह अकेला ऐसा उद्योग है जो प्रदूषणकारी पदार्थ का उपयोग करके एक गैर-प्रदूषणकारी उत्पाद बनाता है। इसके साथ ही यह स्थानीय रोजगार, ग्रामीण उद्यमिता और GST के माध्यम से राजस्व में योगदान देता है।
प्रमुख चुनौतियाँ
इस उद्योग के सामने अनेक गंभीर समस्याएं हैं। सबसे पहली और बड़ी समस्या फ्लाई ऐश की अनियमित एवं अपर्याप्त आपूर्ति है। बिजली संयंत्रों से सूखी फ्लाई ऐश उठाने की प्रक्रिया कठिन और महंगी है। ईंटों की बिक्री दरें कम हैं और खरीदार लंबे समय तक उधार लेते हैं। मशीनों की गुणवत्ता खराब है, कार्यशील पूँजी की कमी है, सटीक लागत गणना का अभाव है और जागरूकता भी बेहद कम है। नीति है, लेकिन उसका क्रियान्वयन नहीं होता और सरकारी अधिकारियों का रवैया अक्सर नकारात्मक रहता है।
8 रणनीतिक कार्य योजनाएं
1. नीति प्रवर्तन — केंद्रीय स्तर पर नीति बनाना, GeM पोर्टल से खरीद, जिला निगरानी सेल की स्थापना और उद्योग स्थापना के लिए न्यूनतम पात्रता मानदंड तय करना।
2. कच्चे माल की सुरक्षा — ताप विद्युत संयंत्रों के साथ दीर्घकालिक और सब्सिडी युक्त MOU, दूरस्थ जिलों में फ्लाई ऐश बैंक की स्थापना, वाहनों में GPS अनिवार्य और अवैध गतिविधियों पर कड़ा कानूनी प्रावधान।
3. बाजार विकास — "बिल्ड ग्रीन बिहार" जागरूकता अभियान, किफायती आवास योजनाओं में अनिवार्य उपयोग, प्रत्येक प्रखंड में मॉडल प्रदर्शनी भवन और ताप विद्युत संयंत्र से 75 किमी के भीतर निजी निर्माण में भी अनिवार्य उपयोग।
4. गुणवत्ता एवं प्रमाणीकरण — BIS अनुपालन, मोबाइल परीक्षण प्रयोगशाला, ईंट निर्माताओं को A, B, C श्रेणी में रेटिंग।
5. वित्तीय सहायता — बिना गिरवी के बैंक ऋण, ब्याज सब्सिडी, बंद पड़ी इकाइयों के लिए पुनर्ऋण, MSME पंजीकरण प्रोत्साहन और विलंबित भुगतान विंग को अधिक कानूनी शक्ति।
6. कौशल एवं क्षमता निर्माण — राजमिस्त्रियों, कर्मचारियों और उद्यमियों को प्रशिक्षण, तकनीक और विपणन पर कार्यशाला।
7. प्रौद्योगिकी एवं डिजिटलीकरण — ऑनलाइन खरीद पोर्टल, GIS मैपिंग, डिजिटल ऑर्डर ट्रैकिंग, TReDS और GeM पोर्टल के माध्यम से खरीद।
8. पर्यावरणीय प्रोत्साहन — कार्बन क्रेडिट योजना, हरित भवन प्रमाण पत्र और CPCB की श्वेत श्रेणी सूची में पुनः शामिल करना।
अनुमानित परिणाम (3 वर्षों में)
3 वर्षों में 80% इकाइयाँ सक्रिय हो सकती हैं, सरकारी खरीद 95% से अधिक हो सकती है, निजी क्षेत्र की भागीदारी 60% तक पहुँच सकती है और ताप विद्युत संयंत्रों की 100% सूखी फ्लाई ऐश का उपयोग संभव है। इसके साथ ही रोजगार में वृद्धि और कार्बन फुटप्रिंट में कमी भी होगी।
B-FABIA की भूमिका
संगठन नीति वकालत, फ्लाई ऐश आपूर्ति वार्ता, NTPC के साथ विवाद समाधान, उत्पादन क्षमता का सटीक आकलन, एकसमान मूल्य निर्धारण और गुणवत्ता नियंत्रण में सहायता करता है।
निष्कर्ष
बिहार में प्रचुर मात्रा में सूखी फ्लाई ऐश उपलब्ध है, निर्माण की माँग बढ़ रही है, घनी आबादी के कारण पर्यावरणीय आवश्यकता भी प्रबल है और कानूनी ढाँचा भी सहायक है। यदि नीति क्रियान्वयन सुदृढ़ हो, कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित हो, वित्तीय सहायता मिले और जागरूकता बढ़े — तो बिहार टिकाऊ निर्माण में राष्ट्रीय नेता बन सकता है।